साहित्य दर्पण

क्यों रे मनुष्य”

आज धरा चीखी चिल्लायी मुझ से किया सवाल,
क्यो मनुष्य मेरी छाती पर तुमने किया बवाल?
जीवन मैंने जना तो तुमने मुझको जननी माना,
पर क्या तुम ऐसा करते हो निज जननी का हाल?
उन्नति के पर्दे के पीछे धधक रहा अंगार,
घोल गरल नभ में, छीना मुझसे प्रेमी का प्यार।
कोप हुआ जिस दिन अम्बर को अग्नी भी बरसेगा,
और स्वतः मुझमें भी होगा लावा का उद्गार।
घाव दिया है गहरा मुझको, खोद रहे हो काया,
नाश किया प्रकृति का तुमने माया को अपनाया।
जो थे तरु मरहम के जैसे मेरे इन घावों के,
निज स्वारथ मिथ्या उन्नति में उनको काट लिया है।
दिवस घटाया जीवन का बहु रोग दोष को लाया,
व प्रसाद मृत्यु का सारे जग में बाँट दिया है।
और कहा वसुधा ने कि मैं हूँ जननी नारी सम,
सहनशील, सुंदर, विनयी, बंकिम चितवन वाली भी।
प्रबल, सबल, प्रीति के संग परित्यक्ति सहा करती हूँ ,
सृजनकार के साथ साथ हूँ विनाशिका काली भी।
मेरे तन को चीर निकलता अंकुर तरु बीजों का,
जैसे जनती है नारी निज शिशु को पीर प्रसव से।
पर हर्षित होती हूँ मैं उस नारी के जैसे जो,
निज पीड़ा को भूल हँसे, शिशु रोदन के अनुभव से।
कहीं-कहीं मेरे तन पर उत्तुंग शैल शिखर है,
और कहीं कहीं पर गहरे से गहरा सागर है।
बना संतुलन इन दोनों गहराई ऊँचाई में,
स्वयं खड़ी हूँ और सकल जीवन को खड़ा किया है।
तुम्हीं अपरदन करते मेरे तन के रज पेशी का,
भूल गए क्या इसी मृदा में तुमको बड़ा किया है।
यह जल, समीर ,तरु ,जीव-जंतु सब मुझसे मैं इनसे हूंँ,
खैर छोड़ दो यह सब, मैंने तुमको जान लिया है।
यदि सवाक् जननी की तुमने दुर्गति कर डाली तो,
मेरी होगी यही दशा अब मैंने मान लिया है।
जननी की दुर्गति करते चाहे हो नर नारी,
और बिचारी मूक पड़ी सहती विपदाएँ सारी।
धरती मतलब धैर्यवान व सहिष्णुता की प्रतिमा,
पर अपने भीतर वो बल का ज्वार लिए रखती हैं।
बाकी जन के लिए अगर जो दैत्य बने संताने,
उन दैत्यों की हत्या को हथियार लिए रखती हैं।
स्यात् धरित्री ने हम पर कोई हथियार चलाया,
निज कर्मों का हमने मधु या कड़वा फल है पाया।

दीपक चौरसिया
जनपद बस्ती, उत्तर प्रदेश

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