संपादकीय/लेख/आलेख

मानवता की सेवा

इंसान जन्म लेता है, जिंदगी गुजारता है और एक दिन इस दुनिया से कूच कर जाता है। क्या, मात्र जीवन जीना और मरना मानव की नियति मानी जाए। नहीं। बचपन और बुढ़ापा छोड़ दिया जाए तो मुश्किल से तीस-चालीस वर्ष ही मानव के अपने हिस्से में आते हैं, जिसमें आधा समय रात्रि का होता है। बाद के शेष समय में भी दैनिक कार्य शामिल होते हैं। अब बचता ही कितना समय है, जिसे हम मानव सेवा हेतु निकालें।
वैसे अन्य जीव भी एक पूरा जीवन जी लेते हैं, परन्तु उनके मरने के बाद उन्हें किन बातों के लिए याद किया जाता है? किंतु इंसान को मरणोपरांत उसे याद न किया जाए तो उसका इस संसार में जन्म लेने का औचित्य ही क्या होगा। इस तरह उस इंसान और अन्य जीवों के जीवन जीने में अंतर ही क्या रह जाएगा।
संसार में मानव ही एक ऐसा जीव है जिसे बुद्धि और विवेक की दृष्टि से श्रेष्ठ माना गया है। सामाजिक प्राणी होने के नाते मानव के कर्त्तव्यों में भी व्यापकता होती है। उसे अपने साथ-साथ अपने परिवार और समाज के लिए भी जीना होता है। दुनिया में बिना किसी उपलब्धि, परोपकारिता, मिलनसारिता और निःस्वार्थता के जीना निरर्थक माना जाता है। हमारी शिक्षा, संस्कृति, संस्कार एवं परंपराएँ इतनी सुदृढ़ हैं कि उनका अनुकरण करने वाला सदैव विशिष्ट बन ही जाता है।
ईश्वर जन्म देता है लेकिन विवेक पर आपका अपना अधिकार होता है, जो आपके भले बुरे के लिए सदैव जवाबदेह होता है। आपके विवेक का निर्णय ही आपके रास्ते चुनता है। फर्क बस इतना होता है कि आपके संस्कार व आप की संलिप्तता आपके विवेक को प्रभावित करती है, जिस अच्छे या बुरे विचार का पलड़ा भारी होता है, आप उसी दिशा में आगे बढ़ जाते हैं। अर्थात परिणति का रास्ता आपके द्वारा पूर्व में ही चुन लिया जाता है।
यह सभी भलीभाँति जानते हैं कि मरने के बाद अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के इंसानों की चर्चा होती है, लेकिन अच्छे इंसानों का याद किया जाना ही समाज में मायने रखता है। देखा गया है कि समाज में लोग जब तक दूसरों के काम नहीं आते, दूसरों के लिए नहीं जीते, तब तक उनकी कोई खास पूछ परख नहीं होती। आपकी आर्थिक, बौद्धिक, पदेन उपलब्धियाँ आपकी अपनी होती हैं, जो मात्र आपके सेवा काल तक ही सीमित होती हैं, लेकिन परोपकारिता, जरूरतमंदों की सेवा, आपकी सहयोगी प्रवृत्ति तथा मिलनसारिता आपकी ऐसी उपलब्धियाँ होती हैं जो आपको चिरस्मरणीय तथा विशिष्ट सम्मान दिलाती हैं।
विगत पचास-साठ साल से मानवीय मूल्यों का निरंतर ह्रास हो रहा है। बड़ी अजीब बात यह है कि एक ओर तो हम शिक्षा और प्रगति के नए सोपानों पर चढ़ रहे हैं वहीं इसके ठीक विपरीत परोपकारिता व सद्भावना के क्षेत्र में हम पिछड़ते जा रहे हैं।आज अर्थ व स्वार्थ की जकड़न इतनी मजबूत होती जा रही है कि हमारे अपनों के लिए भी कोई स्थान नहीं बच पाता।
आज ऐसी परिस्थितियों व परिवेश में यह आवश्यकता महसूस की जाने लगी है कि उक्त बातों को गंभीरता से लिया जाए। यदि यह क्रम जारी रहा तो हमारे मानवीय रिश्तों का कोई औचित्य ही नहीं रह जाएगा। क्या भाई-भाई की अहमियत रह जाएगी। क्या पड़ोसी का औचित्य रह जाएगा। तब कोई निस्वार्थ भाव से किसी की मदद कर सकेगा? अपने और पराए को जब तराजू के एक ही पलड़े में तौला जाएगा तब सारे सामाजिक रिश्ते गड्डमड्ड नहीं हो जाएँगे? स्वजनों और परिजनों में अंतर ही क्या रह जाएगा? यह सब सोचकर ही जब हम असहज हो जाते हैं तब वास्तविकता में क्या हाल होगा।
आज पुनः अपनी संतानों में ऐसे संस्कार और विचारों के रोपण की आवश्यकता प्रतीत होने लगी है, जिससे उन्हें उस कल्पित भयावह परिस्थितियों का सामना न करना पड़े। वर्तमान में हमें भी परोपकारिता और समाज के जरूरतमंदों की मदद करने हेतु आगे आना होगा। सद्भावना को बढ़ावा देना होगा, जिससे हमारी आगे आने वाली पीढ़ी भी इन सबका अनुकरण कर सके, साथ ही उनका महत्व भी समझे। वैसे भी किसी की मदद व परोपकार के पश्चात मिली खुशी का अपना स्थान होता है। मन की शांति और प्रसन्नता आपके जीवन को भी प्रभावित करती है, जो आपके सफल जीवन का एक अहम कारक भी कहा जा सकता है।
आईए हम आज से ही कुछ ऐसे कार्य प्रारम्भ करें जो समाजहित, मानवहित और स्वहित के लिए जरूरी हैं। आपके द्वारा किए गए कार्यों से अगर कुछ लोग भी लाभान्वित हो पाए तो निश्चित रूप से यह आपके जीवन की सार्थकता होगी। साथ ही ये कार्य समाज में मानव सेवा हेतु प्रेरणा के स्रोत भी बनेंगे।
– डॉ. विजय तिवारी ‘किसलय’
जबलपुर

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