साहित्य दर्पण
तन्हाईयां

आज तन्हाईयों में, धड़कता है दिल
कहीं ना कहीं, कभी तो तू मिल
सुबह से शाम तक , ये चलते पैर है
समय तुझको न मिले, ये कैसा बैर है।
बस भागते ही जाते, ये कैसा शहर है
पल भर को रुकने में, क्या टूटे कहर है
आज तन्हाईयों में, सिसकता ये दिल
कहीं न कहीं, कभी तो तू मिल।
वक्त की ये साजिश में, घिरते गए है
थोड़ा डर से, हम सहम से गये है
अब आँखे ढूंढती है, नजरे अश्क को
दस्तक तेरे आहट की, नजरे सनम को।
नजरो ही नजरो से, हम घायल हुए है
ये लहराती जुल्फों, के कायल हुए है
ये बहती हवाओं से, डरता ये दिल
कहीं न कहीं, कभी तो तू मिल।
रचनाकार
श्याम कुमार कोलारे
चारगांव प्रहलाद छिन्दवाड़ा, मध्यप्रदेश



