जोशीमठ में पड़ी दरार सत्ता-शासन और उद्धोगपतियों के तालमेल और धूर्तता का नतीजा : तरुण भनोत

जोशीमठ के आसपास विकास के नाम पर किए जा रहे विनाश कार्य पर तत्काल रोक लगाने पूर्व वित्त मंत्री ने राष्ट्रपति को लिखा पत्र
जबलपुर दर्पण। विदित हो कि जून 2013 में उत्तराखंड में हुए भीषण भूस्खलन और प्राकृतिक आपदा से हुए जान-माल के नुकसान की पीड़ा अबतक हमारे लिए अविस्मरणीय क्षण है | इस आपदा में न जाने कितने ही स्थानीय लोग, पर्यटक और सेना के जवान बेमौत मारे गए और इस आपदा ने जलवायु परिवर्तन के इस दौर में पूरी दुनिया को प्राकृतिक धरोहरों से छेड़छाड़ न करने की सीख दे गई | किन्तु, इस भीषण हादसे से कुछ सीख पाने के बजाये लगातार विकास की अंधी दौड़ मे अपनी प्राकृतिक, सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहरों को एक-एक कर बर्बाद करने पर आमदा है | उक्त आरोप प्रदेश सरकार में पूर्व वित्त मंत्री एवं जबलपुर पश्चिम से विधायक तरुण भनोत ने जोशीमठ के आसपास हो रहे खुदाई और विस्फोटों को रोके जाने को लेकर राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू को प्रेषित पत्र के माध्यम से सरकार पर लगाया है |
राष्ट्रपति को प्रेषित पत्र मे विधायक श्री भनोत ने बताया कि उत्तराखंड स्थित जोशीमठ उन चार मठों मे शामिल है, जिसकी स्थापना स्वयं हमारे आराध्य आदि शंकराचार्य जी ने की थी, किन्तु विकास के नाम पर जोशीमठ के आसपास हो रहे धमाकों ने सबकुछ बदल कर रख दिया है और हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान जोशीमठ को बचाने के लिए उत्तराखंड ही नही बल्कि देश की चारों दिशाओं मे चीख पुकार मची हुई है | जोशीमठ के आसपास हो रहे धमाकों से इस प्राचीन स्थल के अस्तित्व पर खतरे के बादल मंडरा रहे है और सरकारों के द्वारा विकास के नाम पर प्रकृति के साथ किए जा रहे छेड़छाड़ पुनः उसी गलती दोहराई जा रही है, जिस भिवस्तता का साक्षी उत्तराखंड राज्य पहले भी बन चुका है |
उल्लेखनीय है कि जोशीमठ के आसपास हो रहे इन धमाकों और खुदाई को लेकर उसके अस्तित्व को बचाने के लिए 47 वर्ष पूर्व वर्ष 1976 मे गढ़वाल क्षेत्र के तत्कालीन कमिश्नर रहे महेश चंद मिश्रा के नेतृत्व मे बनी कमेटी की रिपोर्ट मे भी इस क्षेत्र मे ड्रेनेज सिस्टम, ईंट, सीमेंट और बजरी के इस्तेमाल के साथ ही ऊंची इमारत बनाने और पहाड़ों पर विस्फोट को पूर्ण रूप से प्रतिबंधित करने का उल्लेख था | किन्तु, यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आखिरकार वर्तमान मे शासन-प्रशासन और बड़े उद्धोग-घरानों के साजिशाना तालमेल, मौन, छल और धूर्तता के साथ ही श्री मिश्रा कमेटी के अनुशंसाओं की अनदेखी ने देश की प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर जोशीमठ पूरी तरीके से दरक चुकी है |
श्री भनोत ने राष्ट्रपति को प्रेषित पत्र के माध्यम से आग्रह करते हुए लिखा कि वर्ष 2013 मे हुए भीषण प्राकृतिक आपदा के करण विस्थापितों को अबतक पुनर्वास की कोई उचित व्यवस्था नही की गई है और अब जोशीमठ के आसपास पुनः विकास के नाम पर ऐसे प्राकृतिक आपदाओं को निमंत्रण दिया जा रहा है, जो निश्चित रूप से निकट भविष्य मे मानव जीवन के लिए बेहद घातक सिद्ध होंगे | अपितु, ऐसे समय मे जब वर्तमान सत्ता और अधिकतर पर्यावरणविदों के बीच का दोस्ताना रिश्ता और तालमेल हमारी सांस्कृतिक धरोहरों को नष्ट करने पर तुली है तो भारत की सर्वाधिक शक्तिशाली और संवैधानिक संस्था की मुखिया होने के नाते पूरे देश की नजर राष्ट्रपति के सख्त निर्देशों पर टिकी है कि उत्तराखंड को इस त्रासदी से तत्काल बाहर निकाला जायें और भविष्य मे देश भर के हमारे किसी भी प्राचीन धार्मिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहरों के साथ छेड़छाड़ पर पूर्ण प्रतिबंध हों |



