जेठ ने हड़प लिया विधवा का मकानन्याय के लिए कलेक्टर की चौखट पर विधवा, अदालत में केस लड़ने तक के नहीं हैं पैसे

सतना जबलपुर दर्पण। तरफ़ देश में महिला सशक्तिकरण की बातें हो रही हैं, वहीं दूसरी ओर सतना जिले में एक विधवा महिला को अपने पुश्तैनी मकान के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है। आरोप है कि महिला के जेठ ने जबरन मकान पर कब्जा कर उसे घर से बेदखल कर दिया है। पीड़ित महिला लक्ष्मी देवी वर्मा, जो कि मजदूरी कर अपने परिवार का भरण-पोषण कर रही हैं, अब कलेक्टर कार्यालय के चक्कर लगा रही हैं क्योंकि उनके पास अदालत में केस लड़ने के लिए भी पैसे नहीं हैं।लक्ष्मी देवी वर्मा, पति स्व. जगदीश प्रसाद वर्मा, निवासी पूनम भवन के पीछे, धवारी गली नंबर 3, तहसील रघुराजनगर, सतना, का आरोप है कि वह जिस मकान में वर्षों से रह रही थीं, वह उनके ससुर के नाम पर था और उनके पति के निधन के बाद वह वारिस होने के नाते उसी मकान में रह रही थीं। लेकिन बीते वर्ष उनके जेठ चंद्रभान वर्मा ने उन्हें जबरदस्ती मकान से निकाल दिया।
उन्होंने बताया कि जेठ ने ना केवल उनसे मारपीट की बल्कि बलपूर्वक सामान बाहर फेंककर उन्हें और उनके बच्चों को बेघर कर दिया।लक्ष्मी देवी ने कहा, “मैं गरीब महिला हूं। झाड़ू-पोंछा, बर्तन मांजकर किसी तरह बच्चों का पेट पाल रही हूं। अब रहने के लिए भी छत नहीं बची। मकान मेरा हक है, लेकिन केस लड़ने के लिए पैसे नहीं हैं। मैंने कई बार प्रशासन से शिकायत की है, अब उम्मीद बस कलेक्टर साहब से है।”
महिला का कहना है कि यदि प्रशासन ने शीघ्र कोई कदम नहीं उठाया, तो “मैं और मेरे बच्चे सड़क पर भूखे मर जाएंगे।”इस मामले ने फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या गरीबों के लिए न्याय सिर्फ पैसेवालों की वस्तु बनकर रह गया है? आज “हड़प नीति” एक सामाजिक विकृति का रूप ले चुकी है, जिसमें कुछ लोग संपत्ति विवादों को जानबूझकर पैदा कर उसे अपने पक्ष में मोड़ लेते हैं।समाजशास्त्रियों का मानना है कि यह सिर्फ कानून व्यवस्था का सवाल नहीं है, बल्कि परिवार तंत्र की विफलता भी है। “जब परिवार के लोग ही बैठकर विवाद नहीं सुलझाना चाहते, तो गरीब व्यक्ति को न्याय के लिए सालों अदालतों के चक्कर काटने पड़ते हैं,” एक स्थानीय वकील ने बताया।अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या जिला प्रशासन लक्ष्मी देवी जैसे पीड़ितों की वास्तविक पीड़ा को समझते हुए ।
बिना न्यायालय प्रक्रिया के भी राजस्व व पारिवारिक संपत्ति विवादों में हस्तक्षेप कर न्याय दिला पाएगा या फिर एक और महिला को न्याय के नाम पर सिस्टम की ठोकरें खाने के लिए छोड़ दिया जाएगा।



