यमराज को धरती पर जन्म लेना पड़ा और भगवान चित्रगुप्त अवतरण कैसे हुआः डा बी के मल्लिक

जबलपुर दर्पण। ब्रह्मा जी ने जब सृष्टि की रचना की तो यमराज जी को सभी प्राणियों के कर्मों का लेखा जोखा और उसके अनुसार से उसको न्याय करने का कार्य दिया था। यह कहानी उस समय की है जब माण्डव्य ऋषि एक महान तपस्वी ऋषि थे जो खांडव वन में अपने आश्रम की एक कुटिया में रहते थे। एक दिन कुछ लूटेरे दौड़ते हुए आए और उन ऋषि से कहने लगे कि कुछ लूटेरे हमारी पीछे लगे हैं जो हमे जान से मारकर हमारा सारी धन लुटना चाहते हैं हम व्यापारी है। आप हमारी रक्षा करें हम आपकी शरण में आए हैं। आप यह धन अपनी कुटिया में छुपा लीजिये और हमें भागने का रास्ता बता दीजिये।माण्डव्य ऋषि ऋषि उन्हें व्यापारी समझकर उनकी सहायता करते हैं और कहते हैं कि ये धन उस कुटिया में छुपा दो और तुम वहां पीछे से भाग जाओ। ले लुटरे धन छुपाकर भाग जाते हैं तभी वहां पर राजा के सिपाही आ जाते हैं और वे ऋषि को लुटेरों की सहायता के अपराध में पकड़ लेते हैं। माण्डव्य ऋषि उनसे कहते हैं कि वे तो कह रहे थे कि हम व्यापरी हैं और कुछ लूटेरे हमारी पीछे पड़े हैं। यह सुनकर राजा के सैनिक कहते हैं ढोंगी साधु तू भी लुटेरों के साथ मिला हुआ है। अब तो इसका फैसला राजा ही करेंगे।
माण्डव्य ऋषि को पकड़कर राजा के सामने खड़ा कर दिया जाता है। राजा कहता है कि साधु के वेष में घोर अपराध क्षमा योग्य नहीं है अत: इस ढोगी को शूली पर चढ़ा दो। माण्डव्य ऋषि राजा को समझाने के प्रयास करते हैं लेकिन राजा नहीं समझता है।
राजा के सैनिक माण्डव्य ऋषि शूली पर चढ़ा देते हैं लेकिन वे अपने तपोबल से शूली पर चढ़े रहते हैं और शूली उनका कुछ नहीं कर पाती है। यह चमत्कार देखकर सैनिक राजा के पास जाते हैं और बताते हैं कि यह तो तपस्वी माण्डव्य ऋषि हैं। यह सुनकर राजा को अपने अपराध का बोध होता है और वह क्षमा मांगने के लिए मुनि के पास आते हैं और उनसे शूली पर से उतरने का निवेदन करते हैं। तब माण्डव्य ऋषि कहते हैं राजा अब इसका निर्णय तो यमराज के समक्ष ही होगा। अब मैं यहां से सीधा उन्हीं के पास जा रहा हूं।
मांडव ऋषि यमराज के पास जाकर पूछते है कि मैंने जानते हुए अपने जीवन में कोई पाप नहीं किया परंतु अनजाने में मुझसे ऐसा कौनसा पाप हुआ जिसका इतना भीषण फल मुझे भोगना पड़ा? तब यमराज कहते हैं कि ये तपोमूर्ति बाल्यपन में आप पतंगों के पूच्छभाग में सिंगे घुसेड़ दिया करते थे उसी का यह फल आपको प्राप्त हुआ।तब माण्डव्य ऋषि कहते हैं कि धर्मशास्त्र के अनुसार जन्म से लेकर बारह वर्ष की आयु तक बालक जो कुछ करे उसे अधर्म नहीं माना जाता। क्योंकि उस समय तक वह अबोध रहता है। सो तुमने बाल्यपन में की गई मेरी मूर्खता को पाप की संज्ञा देकर मेरे साथ अन्याय किया है। दूसरी बात यह है कि तुम ये भूल गए कि न्याय के आसन पर बैठा व्यक्ति अपराध की मात्र के अनुसार ही दंड देता है। उस मात्रा से अधिक दंड देने से अन्याय करने का पाप लगता है। और, जो स्वयं न्यायमूर्ति होकर दूसरों पर अन्याय करें तो वह भीषण अपराध कहा जाता है। अत: हे! धर्मराज इस पाप का दंड भोगने के लिए तुम मनुष्य योनी में जन्म लेकर एक शूद्र माता का गर्भ धारण करके मृत्यु लोक में जन्म लोगे जहां तुम न्याय और अन्याय की गुत्थियां सुलझाते-सुलझाते थक जाओगे। यही तुम्हारा दंड है।
जिसके कारण महात्मा विदुर का जन्म हुआ और महाभारत के समय में न्याय और अन्याय की गुत्थी सलझाते हुए महाराज धृतराष्ट्र को समझाते समझाते उन्होंने मंत्री पद का किया किया।
यमराज द्वारा मांडव ऋषि को गलत तरीके से बंद देने के कारण आपकी चिंतित है काफी चिंतित थे। इस कार्य को कौन करेगा इसके लिए उन्होंने तपस्या करने लगे। उसके पश्चात उनके शरीर से भगवान चित्रगुप्त का अवतरण हुआ यह। यह कार्य उज्जैन के कायथा गांव में चैत्र मास के पूर्णिमा के दिन हुआ। उस समय से सभी प्राणियों का कर्मों का लेखा जोखा भगवान चित्रगुप्त करने लगे प्राण लेने का काम यमराज को दिया गया। चित्रगुप्त को नागवंश के कन्या से शोभावती और नंदिनी से विवाह हुआ। दोनों पत्नी से 12 पुत्र थे जो संपूर्ण भारत के अलग-अलग नसों में जाकर ज्ञान अर्जित की। जिनका नाम श्रीवास्तव, सूर्यध्वज, वाल्मीकि, अष्ठाना, माथुर, गौड़, भटनागर, सक्सेना, अम्बष्ठ, निगम, कर्ण और कुलश्रेष्ठ के नाम से जाने जाते है।



