साहित्य दर्पण
गिद्ध

वो दूर किसी टहनी में बैठकर
निगाह रखते बारीकी से
मौका की ताक में रहते
पल दिवस तारिखी से
मसौदा तैयार करते हमलों का
अमल में लाते अमलों का
फिर ऊँची उड़ान भर करके
पंखों में अनुमान धर करके
काबू में करने चोंच से
काट खाने और नोंच से
टूट पड़ते शिकार पर
निर्बल-असहाय के अत्याचार पर
फिर करकंटक में दबोचकर
गहरी चोंट देने सोंचकर
प्रमय से भी नही कतराते
हिंसक सा नोंच-नोंच खाते
अरे मानव! यही गुण तेरा है
साँप से भयंकर सपेरा है
निर्बल-निकृष्टों को नीच समझ
दरिद्र-गँवार को चीज समझ
गिद्ध सरिस नोंचते जाते हो
मृत घड़ी तक बहुत तड़पाते हो।।
चन्द्रकांत खुंटे ‘क्रांति



