साहित्य दर्पण

शब्द हल्के, अर्थ भारी

मैंने अपने जीवन में बहुत देखा समझा हैं कि शब्द तो कम व हल्के होते है लेकिन उनके अर्थ भारी होते हैं । जैसे स्वास्थ्य के लिये सैर । बहुत से मानव आज कि जीवन शैली के हिसाब से
घूमना – फिरना नहीं करते है जिससे वह तनाव में रहते हैं ।
मुझे इसी सन्दर्भ में देश विदेश में कितने व्यक्तियों ने कहा कि
हम सैर का समय जानते बुझते समझते हुए नहीं दे पाते हैं । कमर दर्द आँखों के दर्द आदि व जीवन शैली से डॉक्टर कितनी बार सलाह भी देते है कि अपना शरीर देखो प्रातः सैर करो । फिर भी नहीं करते इसके परिणामस्वरूप आज के समय के कुछ लालच में हम कल की बीमारी के लिए अपने आपको नियोजित कर रहे है ।इसी तरह जैसे जीवन अपने हिसाब से जीना । एक दिन उम्र ने तलाशी ली तो जेब से लम्हे बरामद हुए । उनमें कुछ ग़म के थे , कुछ नम से थे, कुछ टूटे हुए थे आदि जो सही सलामत मिले उन्हें जिन्दगी आँक रही जीवन का मोल। किसने बनाया कितना अनमोल जीवन ।जीवन तो जीते है मनोरथी श्रावक। । जीना भी सफल वह मृत्यू भी सफल । साक्षात् कर ले दर्शन मृत्यु उत्सव का । तो उम्र ने कहा जीना सार्थक है जो करना है आज कर ले कल का कोई भरोसा नही श्रावक का यह तीसरा मनोरथ हैं ।
कया णं अहं अपच्छिममारणंतियसंलेहणाझूसणाझूसिते भत्तपाणपडियाइक्खिते
पाओवगते कालं अणवकंखमाणे विहरिस्सामि ।
जीवन की यह सांझ सुनहरी, ढल गई वह बीती दोपहरी ।नयी हैं राहें, नयी निगाहें, करने को मन कुछ खुद चाहे ।खुलकर जी लें, खुलकर हँस लें बस जीवन यह कहना चाहे। इसी तरह और भी बहुत शब्द होते हैं जो अपने आप में बहुत हल्के होते है पर उनके अर्थ होते हैं इतने भारी कि वह बात गहरी बहुत ही कम शब्दों मे कह देते हैं।

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