मन के परिग्रह को त्यागना ही है उत्तम आंकिचय धर्म

आलेख : आशीष जैन उप संपादक दैनिक जबलपुर दर्पण 9424322600

दिगंबर जैन संप्रदाय के सभी नागरिक तेरस को पवाॅधिराज पर्यूषण दसलक्षण पर्व के नौवे दिन उत्तम आकिंचन्य धर्म का पालन करते है। आँकिंचन हमें मोह को त्याग करना सिखाता है। जमीन, जायजाद, घर, चाँदी, सोना, धन, अन्न, नौकर, चाकर, कपडे, स्त्री और सुख संसाधनों का मोह न रखकर सिर्फ इच्छाओं पर संयम रखते है तो इससे उनके गुगों एवं कर्मों मे वृद्धि होती है। मोह, मान्यता, गुस्सा, घमंड, कपट, लालच, मजाक, पसंद नापसंद, डर, शोक, और वासना इन सब मोह का त्याग कर के ही आत्मा को शुद्ध बनाया जा सकता है।
सब मोह प्रलोभनों और परिग्रहो को छोडकर ही परम आनंद मोक्ष को प्राप्त कर सकते है। उत्तम आकिंचन्य धर्म को दशलक्षण पूजा पुस्तिका जिनवाणी में भी विस्तृत रूप से वर्णित किया गया है। जिसके अनुसार परिग्रह चौबीस भेद, त्याग करे मुनिराज जी। तिसना भाव उछेद, घटती जान घटाइये। उत्तम अकिंचन गुण जानो, परिग्रह चिन्ता दुःख ही मानो। फाँस तनस सी तन में साले, चाह लंगोटी की दुःख भाले। भाले न समता सुख कभी नर, बिन मुनि मुद्रा धरें। धनि नगन पर तन-नगन ठाई, सुर-असुर पायनी परै। घरमाहीं तिसना जो घटावे, रूचि नहीं संसार सौ। बहु धन बुरा हु भला कहिये, लीं पर उपगार-सौ।
आप अकेला अवतरे, मरे अकेला होय। यूं कबहूं इस जीव का, साथी सगा न कोय। उत्तम अकिंचन धर्म को हम आत्मसिद्धि पाने के लिए आत्मकेंद्रित होना या अपने आप को कर लेना भी कह सकते हैं। आंतरिक संकल्प विकल्पों की परिणति को भी विश्राम मिल जाता है। बाहरी परित्याग के बाद भी मन में मैं और मेरे पन का भाव निरंतर चलता रहता है, जिससे आत्मा बोझिल होती है और मुक्ति की ऊर्ध्वगामी यात्रा नहीं कर पाती। आत्मा, संकल्प, विकल्प रूप कर्तव्य भावों से संसार सागर में डूबती रहती है। परिग्रह का परित्याग कर परिणामों को आत्मकेंद्रित करना ही अकिंचन धर्म की भावधारा कहीं जा सकते हैं। जहा पर भीड़ है, वहां पर आवाज, आकुलता और अशांति है किंतु एकाकी एकत्व के जीवन में न कोई आवाज है औरन कोई आकुलता और न अशांति। हम जहां पर जी रहे हैं वह कर्तव्य तो करना ही है किंतु यथार्थता का बोध हमें रहना चाहिए। संसार में हम सभी का निवास है। पुराने किसी संयोग की वजह से आप यहां एकत्रित हुए हैं किंतु आगे की यात्रा तो आपको एकाकी अकेले ही करनी है। आज का यह धर्म जीवन की यात्रा को एकाकी आगे बढ़ाने का धर्म है जिसमें अपने और पराये का भेद समझकर निर्विकल्प र्निद्वंद्व एकाकी आत्मा की अनुभूति में उतरना पड़ता है। जीवन में प्रतिदिन निरंतर यह भावना भाते रहना चाहिए जिससे एकांकीपन का बोध होता रहता है।
मन के परिग्रह को त्याग करने वाला श्रावक ही वास्तविक रूप में अकिंचन धर्म को अंगीकार कर सकता है। जिसने परिग्रह का त्याग नहीं किया वह अकिंचन धर्म का पालन करने का अधिकारी नहीं हो सकता है, इसलिए प्रत्येक श्रावक को अंदर के परिग्रह को मिटाना होगा। यही जैन मतानुसार उत्तम आकिंचय धर्म है। सभी को दशलक्षण पर्युषण पर्व की शुभकामनाएँ। जय जिनेंद्र।



