डमरूघाटी महादेव के दर्शन मात्र से बनते है बिगड़े काम।
जबलपुर दर्पण / आशीष राय, संपादकीय सलाहकार एवं लेखक।
आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहम्,
पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः।
सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो,
यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम्॥
भावार्थ: हे शम्भो ! आप मेरी आत्मा हैं। माँ भवानी मेरी बुद्धि हैं। मेरी इन्द्रियाँ आपके गण हैं एवं मेरा शरीर आपका गृह है। सम्पुर्ण विषय-भोग की रचना आपकी ही पूजा है। मेरी निद्रा की स्थिति समाधि स्थिति है। मेरा चलना आपकी ही परिक्रमा है एवं मेरे शब्द आपके ही स्तोत्र हैं। वास्तव में, मैं जो भी करता हूँ वह सब आपकी आराधना ही तो है।
मध्यप्रदेश के जबलपुर क्षेत्र में धार्मिक पर्यटन स्थल का रूप में विशाल शिव मंदिर डमरूघाटी आ चूका है। यह नाम कई मनोकामना को पूर्ण करने वाले महादेव भोले शम्भू का एक अद्भुत तीर्थ स्थल के रूप में प्रसिद्ध है। जिला नरसिंहपुर के पचास किलोमीटर दूर गाडरवारा तहसील का वह स्थल जिसने इस तहसील को सम्पूर्ण मध्यप्रदेश में एक धार्मिक पर्यटन के रूप में विकसित किया एवं एक नई पहचान दी। जी हा यह मंदिर एक ख्याति प्राप्त उन मंदिरो में सम्मलित है जिन्हे पावन पर्व पर विशेष प्रशासनिक सुविधा प्रदान की जाती है। उन्ही में से भोले बाबा के महाशिवरात्रि का महापर्व जब भी आता है, प्रदेश के एक मात्र यह ऐसा स्थल होता है जिसके विशाल मेले की तैयारियां में नेशनल हाइवे तक को रोका जाता है। इस भव्य तीन दिवसीय मेले में शासन प्रशासन के मंत्री, सांसद, विधायक, वरिष्ठ अधिकारी की उपस्थित मे भगवान शंकर जी की पूजा के उपरांत इस मेले का शुभारंभ होता है। महाशिव रात्रि के पर्व पर यहाँ कई किलोमीटर दूर दूर से लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते है। अनेक त्रिसूल, ध्वज यात्राएं आती है, जगह जगह भंडारे आ आयोजन होता है। जिसमे नगर की धार्मिक, सामाजिक संस्थाओ का विशेष सहयोग रहता है। महज़ एक नारियल चढ़ावे के उनकी सारी मनोकामना को भगवान शंकर पूर्ण करते है। कहते है डमरूघाटी महादेव के दर्शन मात्र से कईयों के बिगड़े काम बनते है, संतान की प्राप्ति होती, जीवन में सुख समृद्धि आती है। ऐसी कई उदाहरणों यहाँ निरंतर आने वाले श्रधालुओ से सुनने को मिलते है।
ऐसा ही श्रद्धालुओं का मेला सावन सोमवार के दिनों में भी देखा जाता है। जहाँ हजारो की संख्या में दर्शनार्थी आते है। तीस किलोमीटर के क्षेत्र में विराजित माँ नर्मदा के घाटों से सावन माह में कई कावड़ यात्राएं आती है। नर्मदा जल से भोले बाबा का महाअभिषेक किया जाता है। यह अभिषेक का क्रम वर्ष के हर सोमबार को निरंतर होता आ रहा है अब तक 1045 वा रूद्राभिषेक हो चुके है। पूर्व में इस मंदिर का संचालन शिवधाम डमरूघाटी समिति द्वारा किया जाता था विगत माह में यह शासकीय लोकन्यास शिवधाम डमरूघाटी समिति के रूप में परिवर्तित हो चूका है। जिसके अध्यक्ष अनुविभागीय राजस्व अधिकारी एवं सचिव मुख्य नगरपालिका अधिकारी है। उल्लेखनीय है कि सन 1994 में यहां के तत्कालीन डीएसपी स्व. भगवानदास परिहार ने आत्मप्रेरणा से शक्कर नदी के तट के पास इस मंदिर की नीब रखी गई थी। साथ ही समाजसेवी एवं आम जनता के समस्त प्रकार के सहयोग लेकर डमरू के आकार वाली एक घाटी में भव्य शिव मंदिर का निर्माण कराया था। जिसमे करीब चार साल के बाद शिवलिंग के प्राणप्रतिष्ठान की स्थापना सन 1998 में की गई थी। तथा बगल में पवनपुत्र हनुमान जी की विशालकाय प्रतिमा प्रतिष्ठित भी है। साथ ही उक्त मंदिर के अंदर 15 फुट बुनियाद दी गई है। शिवजी की प्रतिमा के ठीक सामने 10 फीट की निचाई चंद्राकार व्यास के 7550 फुट के पक्के मैदान के वृत्त में शिवजी के वाहन नंदी की प्रतिमा निर्मित है। जिसकी मूर्ति 7 फुट ऊंची है। प्रणाम की मुद्रा में आसीन नंदी का मुख चंद्रचूणामणि शिवजी की प्रतिमा की ओर है। जहां नंदी विराजमान है वह अनुमानतः 100 फुट की पृष्ठभूमि में विशाल शिवलिंग का निर्माण किया गया था। उक्त शिवलिंग की धरातल से लेकर ऊपर तक की कुल ऊंचाई 51 फुट है। जन सुविधा की दृष्टि से 15 फुट की ऊंची सीढि़यां बनाई गई है तथा जिलहरी को आकार दिया है। शिवलिंग के अन्दर लम्बाई 21 फुट और कुल गोलाई का व्यास 65 फुट है। मंदिर में प्रवेश के लिए 2 सुसज्जित द्वार भी बनाए गए हैं।
गौरतलब है कि जब इस मंदिर के शिवलिंग प्राणप्रतिष्ठान की स्थापना किया गया था, उस दौरान पड़ने वाली शिवरात्रि में ऐसा जनसैलाब उमड़ा था जिसे आज तक नहीं देखा गया। आज के समय में धर्म के प्रति आस्थावान शहर गाडरवारा में स्थित डमरूघाटी के शिव मंदिर में रोजाना श्रद्घालुओं का तांता लगा रहता है और मप्र के पर्यटन नक्शे पर आने की यह अहमियत भी रखता है। हर वर्ष महाशिवरात्रि एवं सावन सोमवार में हजारों, लाखों की संख्या में यहां महिलाएं और पुरुष आकर शंकरजी की पूजा आराधना और अभिषेक करते है।



