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मतदान अधिकार से बढ़कर है कर्तव्य

महापौर और पार्षद दोनों को वोट देने पर ही पूर्ण होगा मतदान

आलेख : आशीष जैन (उप संपादक) जबलपुर दर्पण

भारत में चुनाव किसी उत्सव से कम में है। चुनावों की अधिसूचना या घोषणा से ही प्रत्याशी, संभावित प्रत्याशी, राजनीतिक दल, आरक्षित अनारक्षित सीट, पार्टी, विचारधाराओं का एक सम्मिलित, विस्तृत और समायोजित माहौल होता है। भारत में चुनाव कराने की पूर्ण जिम्मेदारी भारतीय निर्वाचन आयोग की होती है चुनाव आयोग भी कहा जाता है चुनाव आयोग हर 5 वर्ष में मतदान कराता मतदान करने का अधिकार 18 वर्ष से अधिक आयु वाले लोगों का होता है। मतदान करने वाले को मतदाता कहा जाता है। मतदाता अपनी विचारधारा और प्रत्याशी को देखकर अपने मताधिकार का प्रयोग करता है। अपने नेता का चयन कर उसे सत्ता हासिल कराने में मदद कराता है। भारत को आजादी 15 अगस्त 1947 को प्राप्त हुई। भारत के स्वतंत्र होने के पश्चात 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ। गणतंत्र दिवस के ठीक एक दिन पहले अर्थात 25 जनवरी 1950 भारत निर्वाचन आयोग की स्थापना हुई। इसी भारत निर्वाचन आयोग की की जिम्मेदारी होती है कि वह चुनावों का सफल और सुनियोजित तरीके से संचालन कर सफल बनावे। भारत के प्रत्येक नागरिक को लोकसभा, विधानसभा, नगरी निकाय एवं पंचायत चुनाव में मतदान का विशेष अधिकार प्राप्त होता है। भारतीय गणराज्य में निवास करने वाली प्रत्येक नागरिक अपने मताधिकार का अपनी मर्जी से उपयोग करके, अपना नेतृत्व करने वाला वाला नेता को चुनते है और सरकार बनाने में सहयोग करते है। यही मतदाता सरकार बना और गिरा भी सकता है।

विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत देश की चुनाव प्रणाली हमेशा से ही आश्चर्यचकित करने वाली रहे हैं। लेकिन चुनाव आयोग की मेहनत और सटीक कार्यशैली के कारण प्रत्येक पांच वर्ष में चुनाव संचालित कराना बहुत ही खुशी खुशी का विषय है। समय-समय पर चुनाव आयोग ने अपने आप को सुधारा एवं व्यवस्थित किया जिससे शत प्रतिशत मतदान कराया जा सके। परंतु 60 से 70 प्रतिशत हुआ मतदान भी सराहनीय एवं उत्साहवर्धक माना जाता है। भारत के प्रत्येक नागरिक जो 18 साल या उससे अधिक उम्र का व्यक्ति है मतदान का अधिकार रखता है लेकिन जागरूकता की कमी के कारण शत प्रतिशत मतदान कराना बहुत बड़ी चुनौती के रूप में हम सबके सामने हैं। मतदान के प्रति जागरूकता के लिए चुनाव आयोग समय-समय पर अभियान चलाकर समाचार पत्रों चैनलों में विज्ञापन देकर मतदाताओं को उत्साहित प्रोत्साहित करता रहता है। परंतु मतदान दिवस को छुट्टी का दिन मानने वाले लोग अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं करते। जब आप मतदान के प्रति संवेदनशील नहीं है, जब आप मतदान नहीं करते, तथा आप अपने प्रतिनिधित्व करने वाले को नही चुनते तब उन्हें चुनी हुई सरकार पर उंगली उठाने और उसकी आलोचना करने का अधिकार नहीं है।

इस बार के नगरीय निकाय चुनावों में राज्य निर्वाचन आयोग महापौर और पार्षद दोनों को वोट देने के नियम पर ध्यान दे रहा है। वोटर को दो बोट डालेगा। जिससे मतदान संपन्न माना जाएगा। मतदान केंद्र पर इसके लिए दो मशीनें रखी जाएंगी और दोनों आपस में जुड़ी रहेंगी। पहली मशीन पर पहला वोट करने पर छोटी बीप की आवाज सुनाई देगी, जबकि दूसरा वोट करने पर लंबी बीप की आवाज आएगी। लंबी बीप का अर्थ है कि आपका वोट हो गया।
यदि कोई मतदाता पार्षद या महापौर में से किसी एक में वोट नहीं देना चाहता है तो उसके पास नोटा का विकल्प भी है। नगर निगम चुनाव में इस बार ईवीएम में वीवीपैट की व्यवस्था नहीं है। ईवीएम में पर्ची नहीं निकलेगी। पार्षद की ईवीएम में सफेद और महापौर की में गुलाबी मतपत्र लगा होगा। महापौर की ईवीएम पहले नंबर होगी। इसके बाद पीठासीन अधिकारी आपको बाहर जाने को कहेंगें।

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