सीधी में स्कूल ऑटो और बसों की लापरवाही

सीधी जबलपुर दर्पण । हाईकोर्ट की सख्ती के बाद जिले में वाहन चेकिंग जरूर बढ़ाई गई है, लेकिन जमीनी हकीकत अब भी नहीं बदली। शहर से लेकर गांव तक ऑटो रिक्शा और बसें क्षमता से कहीं ज्यादा बच्चों को ढो रहे हैं। नतीजा यह है कि मजबूरी में बच्चों और अभिभावकों को रोज अपनी जान जोखिम में डालकर सफर करना पड़ रहा है।
सबसे चिंताजनक स्थिति शहरी इलाकों की है, जहां स्कूल आने-जाने वाले बच्चों के लिए चलने वाले ऑटो ओवरलोड होकर दौड़ते हैं। कई बार तो बच्चों को लटककर यात्रा करनी पड़ती है। वहीं, ग्रामीण इलाकों में लगभग सभी ऑटो रिक्शा ओवरलोड ही संचालित हो रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन साफ कहती है कि किसी भी ऑटो में चालक समेत अधिकतम छह लोग ही बैठ सकते हैं और बच्चों को लटकाकर ले जाना पूरी तरह प्रतिबंधित है। बावजूद इसके, इन नियमों का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है।
अप्रैल 2018 में बने थे नियम
बच्चों की सुरक्षा के मद्देनजर अप्रैल 2018 में सरकार ने स्पष्ट निर्देश जारी किए थे कि प्रत्येक स्कूल में वाहन संचालन की निगरानी के लिए एक समिति बनेगी। यह समिति बसों और अन्य वाहनों के रेकॉर्ड, फिटनेस, ड्राइवर की स्थिति, सीट बेल्ट और सुरक्षा मानकों पर नजर रखेगी। लेकिन सीधी जिले में इन नियमों का पालन कहीं नजर नहीं आता।
जांच व्यवस्था का अभाव
प्रदेश के बड़े शहरों में परिवहन और पुलिस विभाग समय-समय पर स्कूल बसों की जांच के लिए कैंप आयोजित करते हैं। वहां बसों की फिटनेस, इमरजेंसी दरवाजे, फर्स्ट एड बॉक्स और ड्राइवर की हेल्थ तक चेक की जाती है। फिट पाए जाने वाले वाहनों को ही सर्टिफिकेट जारी होता है। लेकिन सीधी शहर में न तो स्कूल बसों की फिटनेस जांच होती है और न ही ऑटो रिक्शा पर रोक-टोक।
अभिभावकों की भी अनदेखी
बच्चों की पढ़ाई को लेकर अभिभावक चाहे अपनी आर्थिक क्षमता से बढ़कर खर्च क्यों न करें, लेकिन परिवहन की सुरक्षा पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। जबकि रोजमर्रा में सबसे बड़ा जोखिम बच्चों को ओवरलोड वाहनों से सफर करने में ही उठाना पड़ रहा है।



