चिकित्सकों का रोना वेंटिलेटर पर सिविल अस्पताल ,दो की सेवा समाप्त तीन डॉक्टर के ट्रांसफर से बिगड़े हालात

जबलपुर दर्पण। सिहोरा शासकीय सिविल अस्पताल में लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुरक्षा उपलब्ध कराने को लेकर राज्य सरकार लगातार प्रयास करने का दावा करती है। पर हेल्थ फॉर ऑल, आयुष्मान भारत जैसी योजना चलाई जा रही हैं लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही अलग नजर आ रही है। जिसकी वर्तमान स्थित सिहोरा शासकीय सिविल अस्पताल में भी देखी जा सकती है। विशालकाय भवन में संचालित 100 बिस्तर वाले अस्पताल में क्लास 1 मेडिकल ऑफिसर के सात पर्दों में केवल तीन डॉक्टर ही पदस्थ हैं । जांच सुविधाओं का आलम यह है कि यहां जांच उपकरणों को चलाने के क्लास 1 पैथोलॉजिस्ट का भी गत दिवस स्थानांतरण हो जाने के कारण जांच सुविधा बुरी तरह लड़खड़ा गई है। करोड़ों रुपर खर्च होने के बाद भी सिविल अस्पताल केवल रेफर सेंटर बनकर रह गया है।
इन इन डॉ के स्थानांतरण – डॉ सुशांत शर्मा, डॉ पूजा रैकवार, डॉ प्रवीण द्विवेदी पैथोलॉजिस्ट
दो की सेवा भोपाल से हुई समाप्त – डॉ टीना वाधवा एवं डॉ बिपिन अग्रवाल को राष्ट्रीय बागवानी मिशन भोपाल से सेवा समाप्त कर दी गई हैं।
देखा जाएं तो सिहोरा सिविल अस्पताल में 5 डॉ की कमी से ये समस्या बढ़ गई हैं।
स्वास्थ्य विभाग ने तो स्थानांतरण कर दिए लेकिन डॉ की कमी को पूरा करने भूल गए।
जब इस सम्बन्ध में जानकारी एकत्रित की गई तो सिहोरा नगर की लगभग आबादी 60 हजार से अधिक है। वहीं सिहोरा खण्ड से लगे हुऐ मझौली, ढीमरखेड़ा ,बहोरीबंद तहसील के अनेको गांव इस अस्पताल पर निर्भर हैं। रोजाना गांवों से सैकड़ों लोग उपचार कराने के लिए सिविल अस्पताल पहुंचते हैं। लाखों की जनसंख्या पर खोला गया अस्पताल महज रैफर सेंटर बनकर रह गया है। शासकीय अस्पताल सिहोरा में बेहतर संसाधन उपलब्ध होने के बावजूद भी डॉक्टर की कमी के कारण जिला अस्पताल की शरण लेनी पड़ रही है। इस संबंध में जिम्मेदार कुछ भी बोलने से कतरा रहे हैं।
तत्कालीन इमरजेंसी सेवा में हो रहा विवाद – आम जनता के साथ
नेशनल हाईवे सहित रेल मार्ग का निकटतम अस्पताल होने के कारण प्रतिदिन दुर्घटनाओं में घायल होने वाले 30 से 45 मरीज का आना होता हैं । इसके साथ साथ लड़ाई झगड़ा व पॉयजनिंग सुसाइड सहित अनेक एम एल सी केस के लिए सिविल अस्पताल में पर्याप्त चिकित्सा न होने के कारण आए दिन बाद विवाद की स्थिति बन रही है विदित हो क्लास 1 ऑफिसर को इमरजेंसी ड्यूटी से मुक्त रखा गया है इसलिए इमरजेंसी ड्यूटी का पूरा भार क्लास 2 ऑफिसर पर होता है लेकिन डॉ पूजा रैकवार एवं सुशांत शर्मा क्लास 2 मेडिकल ऑफिसर के स्थानांतरण हो जाने के कारण अस्पताल में कुल तीन चिकित्सक डॉ ही बच्चे हुऐ हैं। तीनों शिफ्ट में एक-एक चिकित्सक की ड्यूटी लगाने के बाद वीकली आफ, कोर्टकेस अवकाश लेने पर इमरजेंसी सेवा पूरी तरह लड़खड़ा गई है । जिसका सर्वाधिक असर पोस्टमार्टम केस पर भी पड़ता है। स्थानीय नागरिकों ने पटरी से उतर रही स्वास्थ्य सुविधाओं पर चिंता व्यक्त करते हुए विधायक सहित जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों से अस्पताल में चिकित्सकों की कमी दूर करने की मांग की है।
300 ओ पी डी के लिए तीन डॉक्टर
गर्मी के तेज प्रकोप के कारण मरीजों की संख्या तीन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रतिदिन लगभग 300 से अधिक मरीज ओपीडी में चिकित्सा सुविधा प्राप्त करने आते हैं लेकिन डॉक्टर की कमी के कारण मरीज को घंटे इंतजार करना पड़ता है। ओपीडी के हालात यह हैं की दंत चिकित्सक बुखार सहित अन्य बीमारियों का ओपीडी में इलाज कर रहे हैं।
सौ बिस्तरों की सुविधा, विशेषज्ञ नहीं
100 बिस्तर वाले सिहोरा अस्पताल में स्विक्रत पदों के अनुपात में आधे से कम डॉक्टर तैनात किए गए हैं. तीन चिकित्सक नाइट ड्यूटी, इमरजेंसी व ओपीडी में अपनी सेवाएं दे रहे है। विशेष्यक्ष चिकित्सक नहीं होने के कारण मटीजेों को जबलपुर जाना पड़ रहा है। वहां केवल प्राथमिक उपधार ही मरीजों को मिल पाता है।
शो-पीस बनी बेशकीमती मशीनें
मरीज की जांच के लिए सिविल अस्पताल में एक्सरे, सोनेग्राफी, जैसी मंहगी मशीनें उपलब्ध्य है। लेकिन पैथोलॉजिस्ट का स्थानांतरण हो जाने के कारण अब मरीजों की जांच नहीं हो पाती। मरीज को बाहर के सेंटर से जांच करानी पड़ रहीं। इससे मरीजों को आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है।



