गामा जबलपुर में हारे ?

अपने घर परिवार गांव शहर की बखानना कोई अनोखी बात नहीं है। कुछ बखान ऐसे होते हैं कि आरसी क्या। आप इलाहाबाद से अमरूद या नागपुर से संतरे ला कर पेश कर सकते हैं, तो हम जबलपुर वाले आप को भेड़ाघाट घुमा देंगे। हां, कुछ दावे कपोल कल्पित लगते हैं। जैसे कि रूस्तमे जहां गामा अपने जीवन की एकमात्र कुश्ती जबलपुर में हारे थे। लीजिए आप की सारी भंगिमा प्रश्न-वाचक चिन्ह बन गईं।
यह चर्चा यहां जब तब उठा करती थी। अगर ऐसा हुआ होगा तो सन् 1910 के पहले का वाक्या होगा, क्योंकि सन् 1910 में ही गामा ने लंदन में आयोजित दंगल में जिविस्को को मात दे रूस्तमे जहां का खिताब पाया था। अतएव चर्चा शैली का सुख जरूर था। यदि प्रमाणित करना कठिन था तो नकारना ही कौन आसान था ?
यह प्रसंग वर्ष 1981 में उस समय उठा जब आकाशवाणी जबलपुर केन्द्र ने ‘जबलपुर खेल की दुनिया में’ प्रसारित की। वार्ताकार थे-विनोद श्रीवास्तव ‘खस्ता’। विनोद श्रीवास्तव ‘खस्ता’ आकाशवाणी के बेहतरीन उद्घोषक और कमेंटट्रेटर थे। वे रामानुजलाल श्रीवास्तव ‘ऊंट’ के पुत्र थे। लिहाजा विनोद श्रीवास्तव ‘खस्ता’ तथ्यों से किसी भी तरह का समझौता नहीं करते थे।
विनोद श्रीवास्तव ‘खस्ता’ ने सन् 1900 में जन्मे बुजुर्गों को खोजने का निश्चय किया। नहीं मिलते तो कुछ पक्की तौर पर सुनी सुनाई जानकारी ही मिले। छोटी ओमती के राठौर परिवार के मोती सिंह राठौर का कहना था कि जिसने गामा को हराया था, उनका नाम तो वे नहीं जानते, लेकिन वे कोई तांगेवाले थे। घटना के एक गप्प होने की संभावना बढ़ी। प्रदेश कुश्ती संघ के पदाधिकारी विजय पटैल ने कहा कि वयोवृद्ध खलीफ़ा नवाब खान से मिलिए। उनके दामाद खेल पत्रकार कादिर खान आफरीदी हैं। मछरहाई की मस्ज़िद में शाम की नमाज़ के बाद मुलाकात हुई। ऊंचे क़द के नवाब खान साहब का कहना था- हां यह सच है, लेकिन वह जोड़ कोई जोड़ नहीं थी। उस कुश्ती मुकाबले को खान साहब ने तो नहीं देखा था, लेकिन उनके बड़े भाई ने देखा था और आंखों देखा हाल सुनाया था। खान साहब की उम्र उस समय करीब दस वर्ष की रही होगी।
गामा भाई-बंधुओं-बुजुर्गों के साथ जबलपुर आए। देख कर ही आभास होता था कि ज़िस्म में ताकत कूट कूट कर भरी है। उन्होंने शहर में आम चुनौती दे डाली। किसी ने हिम्मत नहीं की। उन दिनों ओमती में जनाब रूस्तमजी की विदेशी शराब और सामान की दुकान थी। उनके साहबज़ादे मंशा सेठ ने अपने मुलाजिम इशाक़ से कहा तू लड़। इशाक़ उनका तांगा भी चलाते थे। मंशा सेठ ने कहा हार-जीत का प्रश्न नहीं शहर की बात, कोई सामने नहीं आया।
इशाक़ पहलवान को मैंने नहीं देखा परन्तु मंशा सेठ के अक्सर अपने प्रिय लिबास पैजामा कमीज़ और पैरों में काले पम्प शू पहिने दुकान के बरांडे में बैठे मैंने भी देखा है। वे उस मुस्लिम बाहुल्य मुहल्ले में उनके लिए एक सदस्यीय पंचायत थे। सभी उनका कहा मानते थे। इशाक़ पहलवान ने भी माना।
नवाब खान ने कहा-‘’कोई मुकाबला नहीं था, साहब। पुराने जबलपुर के उत्तर पूर्वी मैदान में कुश्ती हुई। देखने वालों की भीड़ कम नहीं थी। गामा ने इशाक़ को यूं दबोच दिया जैसे कि शेर अपने शिकार को। चाहते तो चित्त कर देते। पर वे इस ख्याल से पकड़ ढीली कर बैठे कि उठ कर इसे कोई दांव से ही चित्त फेकूंगा। बस इतनी ची चूक से वे मात खा गए। इशाक़ ने पकड़ी ढीली होते ही बाज़ी पलट दी। अब लाख कहो ऐसा नहीं ऐसा था, पर होता क्या ?
कहा जाता कि गामा को कमरे में बंद रखना पड़ा। इशाक़ को जवाबी बाजी के लिए लालच दिए गए पर वे तो बस मालिक का हुकुम बजाना था, बजा चुके थे। वरिष्ठ अधिवक्ता मोतीशंकर झा ने रूस्तमजी परिवार में इशाक़ के मुलाजिम होने को सही कहा था। उन्होंने कहा कि अक्सर उनको रूस्तमजी के बंगले के अहाते में लकड़ी चीरते देखा था। मध्यप्रदेश टेबल टेनिस संघ के भूतपूर्व अध्यक्ष ए. बी. पटैल रूस्तमजी परिवार के पड़ोसी थे, इसकी पुष्टि की। इशाक़ को दुबारा लड़ने के लिए जो प्रलोभन दिए गए, उनका जिक्र भी पटैल ने किया। आगे हाल बतलाते हुए नवाब ख़ान ने जो सुनाया वह यदि कपोल कल्पित भी हो तो उसे यथार्थ ही मानना चाहिए। क्योंकि उससे एक महान् चैम्पियन के व्यक्तित्व की सही छवि उभरती है।
इशाक़ बाद में कलकत्ते चले गए। वहां, वे फुटफाथ पर दुकान लगाते थे। गामा ने आने कलकत्ता प्रवास में उनको पहचान लिया। तब तक विश्व में वे विख्यात हो चुके थे। वे बड़े खुलूस के साथ इशाक़ से मिले। दावत दी, उपहार दिए। इशाक़ ने अपनी नाचीजगी का इज़हार किया तो बोले-‘’आप के कारण मेरी वह कमजोरी हमेशा के लिए दूर हुई जिसे घमंड कहते हैं और मैं इतना हासिल कर सका’’
#पंकज स्वामी



