गीता तेरा ज्ञान अमृत

जबलपुर दर्पण। गीता अध्याय 12 श्लोक 8 से 19 तक में अपना मत बताया है। गीता अध्याय 12 श्लोक 8 में गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि मुझमें मन लगा, मेरे में बुद्धि लगा, मुझे प्राप्त होगा। इसी प्रकार (ऊध्र्वम्) ऊपर वाले अव्यक्त की भक्ति करेगा तो उसे प्राप्त होगा, इसमें कोई संशय नहीं है। गीता अध्याय 12 श्लोक 9 में गीता ज्ञान दाता कहता है कि यदि मेरी प्राप्ति चाहता है और यदि तू मन को मुझमें लगाने में समर्थ नहीं है तो हे धनंजय! “अर्जुन!‘‘ अभ्यास योग अर्थात् नाम-जाप तथा नित्य पाठ करना आदि-आदि अभ्यास साधना कहलाती है, को करके मुझे प्राप्त करने की इच्छा कर।गीता अध्याय 12 श्लोक 10 में गीता ज्ञान दाता कहता है कि यदि नाम-जाप नित्य पाठ आदि-आदि अभ्यास करने में भी समर्थ नहीं है तो (मत् कर्म परमः) मेरे लिए श्रेष्ठ कर्म करने वाला हो जा। इस प्रकार मेरे लिए शुभ कर्म करता हुआ भी सिद्धि को प्राप्त कर लेगा।
गीता अध्याय 12 श्लोक 11 में गीता ज्ञान दाता कहता है कि यदि (मद्योगम = मत् योगम्) मेरे द्वारा बताई गई भक्ति साधना पर आश्रित होकर उपरोक्त साधना करने में भी तू समर्थ नहीं है तो (यतात्मवान् = यत आत्मवान्) यति आत्मा वाला हो जा। “यति‘‘ का अर्थ है अपनी पत्नी के अतिरिक्त किसी भी स्त्राी के प्रति विषय विकारवश होकर मन में कभी द्वेष उत्पन्न न होता हो, उसे यति पुरूष कहते हैं। जैसे श्री रामचन्द्र जी को यति अर्थात् सन्त भाषा में “जति” कहा जाता है। श्री सुखदेव = शुकदेव पुत्र श्री ब्यास को भी यति = जति माना गया है तथा सीता पत्नी श्री रामचन्द्र को “सती” माना गया है। इसलिए कहा है कि यतात्मवान् अर्थात् यति पुरूष बनकर सर्व कर्मों के फल का त्याग कर। गीता अध्याय 12 श्लोक 12 में गीता ज्ञान दाता कहता है कि (अभ्यासात्) नाम जाप, नित्य पढ़ आदि-आदि जो अभ्यास किया जाता है, उससे श्रेष्ठ ज्ञान है अर्थात् जिज्ञासु बनकर ज्ञान प्राप्त कर। ज्ञान से ध्यान अर्थात् हठ साधना करके समाधि लगाना यहाँ गीता ज्ञान दाता के मतानुसार ध्यान कहा है। जिसका अनुसरण सर्व ऋषिजन किया करते थे। जिसे वर्तमान में (मैडिटेशन) कहते हैं। ध्यान से श्रेष्ठ सर्व कर्मों का फल का त्याग है क्योंकि त्याग से तत्काल शान्ति प्राप्त हो जाती है। (यह गीता ज्ञान दाता का मत है।गीता अध्याय 12 श्लोक 13 .14 में गीता ज्ञान दाता कहता है कि जो व्यक्ति सब प्राणियों से द्वेष भाव रहित है। सब का मित्र है और दयालु है। जैसे राजा जनक था। ममता रहित अहंकार से रहित सुख-दुःख में समान रहता है, क्षमावान् है, जो (योगी) साधक निरन्तर संतुष्ट है। (यतात्मा) यति पुरूष हैं, दृढ़ निश्चय वाला है अर्थात् जो मैंने ज्ञान अपना मत या वेद ज्ञान बताया है, उसको दृढ़ निश्चय से पालन करता है। वह मुझ पर समर्पित मेरा भक्त मुझे प्रिय है।
इसी प्रकार गीता अध्याय 12 श्लोक 15 से 19 तक में अपना मत कहा है जो केवल नास्तिकता की ओर ले जाने वाला है। जैसे ऊपर किए गए उल्लेख में (गीता अध्याय 12 श्लोक 8 से 12 तक) कहा है किःमुझ में मन लगा, यदि मन नहीं लगा सकता तो नाम, जाप तथा नित्य पाठ आदि का अभ्यास किया कर। अभ्यास का अर्थ है नित्य प्राप्ति बार-बार कर्म करना। नाम-जाप, नित्य पाठ करके मुझे प्राप्त करने की इच्छा कर। यदि नाम जाप, नित्य पाठ भी नहीं कर सकता तो मेरे लिए अर्थात् परमात्मा के लिए कर्म करने वाला हो जा। उदाहरण के लिए जैसे धार्मिक कर्म करते हैं। कहीं कम्बल बाँट दिए, कहीं भोजन भण्डारा कर दिया, कहीं मन्दिर बना दिया, कहीं प्याऊ बनवा दी, पक्षियों को अनाज डाल दिया आदि-आदि भगवान के प्राप्ति किए कर्म कहलाते हैं। इनके करने से कुछ सिद्धी प्राप्त हो जाएगी। प्रिय पाठको! ध्यान से विचारो, इस श्लोक में इन कर्मों से होने वाला फल भी बता दिया है कि “सिद्धी” प्राप्त हो जाती है। फिर साधक स्वयं झाड़-फूंक, जन्त्र-मन्त्र, आशीर्वाद तथा दुआ-बद्दुआ देने योग्य हो जाता है और महर्षि प्रसिद्ध हो जाता है। (गीता अध्याय 12 श्लोक 10)
यदि भगवान के लिए कर्म भी नहीं कर सकता है तो यति (जति) पुरूष बनकर कर्म फल का त्याग कर।



