गोटेगांव कालेज अव्यवस्था का गढ़ बना उच्च शिक्षा का मंदिर

गोटेगांव जबलपुर दर्पण । नगर में एक मात्र शासकीय उच्च शिक्षा का मंदिर जिसकी स्थापना 1968 में हुई थी।आज इसकी स्थिति भयावह होती जा रही है।जिसका धनी धोरी कोई नहीं है।प्रभारी प्राचार्य के भरोसे उच्च शिक्षा के मंदिर की गाड़ी आक्सीजन पर चल रही है।भगवान भरोसे चलने वाला गोटेगांव का एकमात्र उच्च शिक्षा का केंद्र शासकीय ठाकुर निरंजन सिंह महाविद्यालय जिस प्रभारी अधिकारी के भरोसे चल रहा है वहां कोई देखने और जांच करने वाला नहीं है।प्रभारी प्राचार्य पूरी ड्यूटी ना करके दोपहर में दो बजे महानगरी एक्सप्रेस से वापिस अपने घर चले जाते हैं।उन जवाबदार अधिकारी अप डाउन के भरोसे कॉलेज चला रहे हैं उनका कहना है कि जैसे पहले के प्राचार्य और अधिकारी करते थे हम वैसा ही कर रहे हैं। तत्कालीन प्राचार्य डॉक्टर आर पी गौतम के जाने के बाद यह महाविद्यालय चारागाह बनता जा रहा है खंडहर और कचरा घर बनता जा रहा है इस कॉलेज की साफ सफाई व्यवस्था दम तोड़ रही है।लाखों रुपयों से आने वाला जनरेटर कबाड़ हो रहा है कोई देखरेख ही नहीं हो रही है कालेज का मेंटेनेंस नहीं हो पा रहा है।विगत कुछ वर्षों पहले लगी आग या लगाई गई आग की लपटों की कालिख भी अभी तक नहीं छूट पाई है रंग रोगन को बिल्डिंग तरस रही है दैनिक वेतन पर कार्य करने वाले कर्मचारी सुबह से कार्यालय बंद होने तक ड्यूटी करते हैं जबकि प्रभारी प्राचार्य नौकरी में प्रति माह शासन से आवास भत्ता भी ले रहे हैं।साथ ही जबलपुर से गोटेगांव प्रतिदिन अप डाउन करते हैं उनके देखा देखी में दैनिक वेतन के कर्मचारियों को छोड़कर सभी प्रोफेसर भी अप डाउन करते नजर आ रहे हैं।शासन के किसी भी नुमाइंदे की नजर इस ओर नहीं जा रही है। इस महाविद्यालय का दुर्भाग्य ही है कि यहां पर कोई स्थाई प्राचार्य की नियुक्ति नहीं हो पा रही है यह भी देखा गया है दैनिक वेतन पर कार्य करने वाले बेचारे कर्मचारियों को अधिकारी की तानाशाही का शिकार होना पड़ रहा है जिस कारण इन दैनिक वेतन पर कार्य करने वालों को दो दो माह से अभी समाचार लिखे जाने तक पगार भी नहीं मिली है इस प्रभारी प्राचार्य का तानाशाही पूर्ण रवैया क्या गुल खिलाएगा नगर के जन चर्चा का विषय बना हुआ है ऐसा भी प्रतीत हो रहा है कोई भी बहादुर या मुर्दार कोई जनप्रतिनिधि ही नहीं है जो इस डूबते हुए उच्च शिक्षा के मंदिर से तानाशाह प्रभारी प्राचार्य को हटाकर कोई स्थाई विकल्प खोजकर इसका स्थाई समाधान करे।अब देखा जाए कि ये सभी तानाशाही किस के संरक्षण में हो रही है जिससे अध्ययनरत छात्रों का जीवन भी कैसा होगा क्या उन्हें उच्च शिक्षा के मंदिर में ऐसे तानाशाही प्रभारियों के कारण ज्ञान अर्जित हो पाएगा।
जनभागीदारी कर्मचारियों का नहीं हो रहा मानदेय
सूत्रों के अनुसार गोटेगांव विधानसभा क्षेत्र के विधायक द्वारा विधानसभा में लगाए गए प्रश्न का प्रभारी प्राचार्य ने गलत जवाब दिया गया है।जिसकी जांच होना जरूरी हो गया है।
विनियमित हुए कर्मचारियों को महंगाई भत्ता भी नहीं दिया जा रहा है।
प्रभारी प्राचार्य की मनमानी से कर्मचारी परेशान हो रहे है।
यह भी चर्चा का विषय बना हुआ है कि प्रभारी प्राचार्य जबलपुर से प्रतिदिन गोटेगांव आना जाना करते हैं इसके बावजूद भी प्रभारी प्राचार्य के द्वारा आवास भत्ता के नाम से पैसा निकाला जा रहा है।
जबकि प्रभारी प्राचार्य सहित अन्य स्टाफ भी अप डाउन कर रहा है।शासन अंध मूक और बधिर बना हुआ है।
ठा. निरंजन सिंह महाविद्यालय की दुर्दशा, शिक्षा का मंदिर उपेक्षा का शिकार होता जा रहा है इसका परिदृश्य ऐसा है कि देखते ही बनता है।अपने कर्तव्यों पर हंसी उड़ाता प्रतीत हो रहा है।
जिम्मेदार-लापरवाह सरकार की शिक्षा प्रणाली पर उठे सवाल।
क्षेत्र में चर्चा का विषय नगर का इकलौता कालेज शासकीय ठाकुर निरंजन सिंह महाविद्यालय इन दिनों गंभीर अव्यवस्थाओं और प्रशासनिक लापरवाही की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है। अंधे पीसे कुत्ते खाएं वाली कहावत चरितार्थ होती जा रही है।जहां एक ओर सरकार “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ”, “शिक्षित भारत” जैसे नारे बुलंद कर रही है, वहीं दूसरी ओर यह महाविद्यालय शिक्षा के साथ मज़ाक बनकर रह गया है। जी और संबंधित जनप्रतिनिधि अधिकारी अपनी जिम्मेदारी भूलकर गहरी नींद में सोए हुए हैं जिसके चलते शिक्षा का मंदिर अब अपनी दुर्दशा के आंसू बहा रहा है जिसके अभाव में अब विद्यार्थियों का भविष्य अंधकार में होता जा रहा है। जिससे सरकार की शिक्षा प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
शौचालय की हालत शर्मनाक: फैली दुर्गंध
महाविद्यालय के शौचालय की स्थिति मानव गरिमा को ठेस पहुँचाने वाली है। फर्श उखड़े हुए हैं, दीवारें गंदी और सीलनभरी हैं, और छत से प्लास्टर झड़ रहा है। छात्र-छात्राएं इन शौचालयों का उपयोग करने से भी कतराते हैं, जिससे स्वास्थ्य पर भी खतरा मंडरा रहा है।
राशि निकलती रही, हालात बिगड़ते रहे:
विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, हर वर्ष महाविद्यालय प्रबंधन के नाम पर लाखों रुपये खर्च किए जाने का दावा किया जाता है। लेकिन स्थिति इसके बिल्कुल उलट है। कहीं कोई मरम्मत, रखरखाव या सफाई के नाम पर कार्य नहीं हुआ। सवाल यह है कि आखिर ये राशि कहाँ जा रही है?
प्रोफेसर और प्राचार्य: समय पर नहीं, समर्पण
यह भी सामने आया है कि प्राचार्य से लेकर जबलपुर से आने वाले अधिकांश प्रोफेसर समय से कॉलेज नहीं पहुँचते। देर से आना और जल्दी लौट जाना यहाँ की आदत बन चुकी है। इस लापरवाही का खामियाजा छात्रों को भुगतना पड़ रहा है, जिनकी पढ़ाई लगातार प्रभावित हो रही है।
महाविद्यालय की छवि पर गहराहा संकट:
दीवारों की सीलन, टूटी छत, गंदे शौचालय और अव्यवस्थित कक्ष — ये सब ठाकुर निरंजन सिंह महाविद्यालय की छवि को धूमिल कर रहे हैं। यदि जल्द सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो किसी बड़े हादसे की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
स्थानीय जनता और छात्रों की मांग: बढी मांग
अब समय आ गया है कि उच्च शिक्षा विभाग, जनप्रतिनिधि और प्रशासन इस उपेक्षित महाविद्यालय की सुध लें। भ्रष्टाचार और लापरवाही की जाँच हो, राशि का लेखा-जोखा सार्वजनिक हो और कॉलेज को फिर से एक आदर्श शैक्षणिक संस्थान के रूप में स्थापित किया जाए।
विनियमित हुए कर्मचारियों को मानदेय पर वर्तमान महंगाई भत्ता नहीं दिया जा रहा है। शासन के आदेशों की अवेहलना प्राचार्य की हठधर्मिता को प्रदर्शित करती है। जिससे कर्मचारियों में नाराजगी व्याप्त है।
(2) प्राचार्या श्रीमती ए. कोष्टा महाविद्यालय में सक्षम अधिकारी साबित नहीं हो पा रही है जिससे महाविद्यालय गर्त में जाने को अडिग है।
(3) महाविद्यालय में न ही बच्चों की कक्षाओं का सुचारू रूप से संचालन हो पा रहा है। ओर न ही बच्चों को सुख सुविधाएं मिल पा रही है। बच्चों के द्वारा विकास के नाम से फीस लेना और फिर न हीं उन बच्चों को सुविधाएं देना। यह एक बड़े घोटाले को सूचित करता है।
(4) महाविद्यालय में लगभग 2000 के करीबन बच्चे शिक्षा ग्रहण करने जाते है लेकिन महाविद्यालय में एक भी शौचालय नहीं है। जो है उनके लिए लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों द्वारा निरीक्षण में बताया गया कि ये जर्जर स्थिति में हैं। इस एरिया को सूचना के माध्यम से बच्चों के इस तरफ न आने दिया जावे। लेकिन प्राचार्य के द्वारा इस पर भी कोई कार्यवाही नहीं की जा रही है।अगर कोई दुर्घटना हो जाय तो इसका कौन जवाबदार है!
(5) गोटेगांव के विधायक द्वारा विधानसभा में प्रश्न लगाया गया था जिसमें पूछा गया था कि शासन के आदेशानुसार विनियमित हुए कर्मचारियों को क्या वर्तमान दर से महंगाई भत्ता दिया जा रहा है कि नहीं जिसका जवाब प्राचार्य द्वारा गलत जानकारी तैयार कर शासन को भी भेज दिया गया है। जिसकी उचित जांच होना चाहिए ।
(6) प्रभारी प्राचार्य श्रीमती ए. कोष्टा के द्वारा जबलपुर से गोटेगांव अपडाउन भी किया जाता रहा है।जिसकी जानकारी उच्चाधिकारियों को भी लेकिन कोई कार्यवाही नहीं की जाती है।
लेकिन आवास भत्ता के नाम पर पूरी राशि निकाल ली जाती। राशि निकलने का ऐसा फर्जीवाड़ा विगत वर्षों से लगातार अपने साथ साथ सभी नियमित कर्मचारियों को इसका फायदा मिलता है।
(7) अतिथि विद्वान एवं शिक्षकों पर प्रभारी बॉस की विशेष मेहरबानी है। मैडम के द्वारा इन शिक्षकों पर कोई दबाव नहीं है न ही इनके द्वारा कोई कक्षाएं ली जाती है। लोकल का जो स्टाफ है ये सार्थक ऐप में बस उपस्थिति लगाने आते है सुबह ओर शाम ओर इनको पूर्ण वेतन देने की इनको पात्रता है।
(8) प्राचार्य के पतिदेव के मार्गदर्शन में हो रहा महाविद्यालय का संचालन
(9) महाविद्यालय का भवन जर्जर हो रहा है आय दिन लेंटर की छाप पोर्च में कही बाथरूम में कही गैलरी की गिर रही है। महाविद्यालय प्रबंधन इस पर कोई कार्य नही करवा रहा है और न ही कोई कार्यवाही की जा रही है।
कबाड़ हुआ महाविद्यालय।
जन चर्चा का गढ़ बनता उच्च शिक्षा का मंदिर।
यह है नगर में एक मात्र शासकीय उच्च शिक्षा का मंदिर जिसकी स्थापना 1968 में हुई थी।आज इसकी स्थिति भयावह होती जा रही है।जिसका धनी धोरी कोई नहीं है।प्रभारी प्राचार्य के भरोसे उच्च शिक्षा के मंदिर की गाड़ी आक्सीजन पर चल रही है।भगवान भरोसे चलने वाला गोटेगांव का एकमात्र उच्च शिक्षा का केंद्र शासकीय ठाकुर निरंजन सिंह महाविद्यालय जिस प्रभारी अधिकारी के भरोसे चल रहा है वहां कोई देखने और जांच करने वाला नहीं है।प्रभारी प्राचार्य पूरी ड्यूटी ना करके दोपहर में दो बजे महानगरी एक्सप्रेस से वापिस अपने घर चले जाते हैं।उन जवाबदार अधिकारी अप डाउन के भरोसे कॉलेज चला रहे हैं उनका कहना है कि जैसे पहले के प्राचार्य और अधिकारी करते थे हम वैसा ही कर रहे हैं। तत्कालीन प्राचार्य डॉक्टर आर पी गौतम के जाने के बाद यह महाविद्यालय चारागाह बनता जा रहा है खंडहर और कचरा घर बनता जा रहा है इस कॉलेज की साफ सफाई व्यवस्था दम तोड़ रही है।लाखों रुपयों से आने वाला जनरेटर कबाड़ हो रहा है कोई देखरेख ही नहीं हो रही है कालेज का मेंटेनेंस नहीं हो पा रहा है।विगत कुछ वर्षों पहले लगी आग या लगाई गई आग की लपटों की कालिख भी अभी तक नहीं छूट पाई है रंग रोगन को बिल्डिंग तरस रही है दैनिक वेतन पर कार्य करने वाले कर्मचारी सुबह से कार्यालय बंद होने तक ड्यूटी करते हैं जबकि प्रभारी प्राचार्य नौकरी में प्रति माह शासन से आवास भत्ता भी ले रहे हैं।साथ ही जबलपुर से गोटेगांव प्रतिदिन अप डाउन करते हैं उनके देखा देखी में दैनिक वेतन के कर्मचारियों को छोड़कर सभी प्रोफेसर भी अप डाउन करते नजर आ रहे हैं।शासन के किसी भी नुमाइंदे की नजर इस ओर नहीं जा रही है। इस महाविद्यालय का दुर्भाग्य ही है कि यहां पर कोई स्थाई प्राचार्य की नियुक्ति नहीं हो पा रही है यह भी देखा गया है दैनिक वेतन पर कार्य करने वाले बेचारे कर्मचारियों को अधिकारी की तानाशाही का शिकार होना पड़ रहा है जिस कारण इन दैनिक वेतन पर कार्य करने वालों को दो दो माह से अभी समाचार लिखे जाने तक पगार भी नहीं मिली है इस प्रभारी प्राचार्य का तानाशाही पूर्ण रवैया क्या गुल खिलाएगा नगर के जन चर्चा का विषय बना हुआ है ऐसा भी प्रतीत हो रहा है कोई भी बहादुर या मुर्दार कोई जनप्रतिनिधि ही नहीं है जो इस डूबते हुए उच्च शिक्षा के मंदिर से तानाशाह प्रभारी प्राचार्य को हटाकर कोई स्थाई विकल्प खोजकर इसका स्थाई समाधान करे।अब देखा जाए कि ये सभी तानाशाही किस के संरक्षण में हो रही है जिससे अध्ययनरत छात्रों का जीवन भी कैसा होगा क्या उन्हें उच्च शिक्षा के मंदिर में ऐसे तानाशाही प्रभारियों के कारण ज्ञान अर्जित हो पाएगा।
जनभागीदारी कर्मचारियों का नहीं हो रहा मानदेय
सूत्रों के अनुसार गोटेगांव विधानसभा क्षेत्र के विधायक द्वारा विधानसभा में लगाए गए प्रश्न का प्रभारी प्राचार्य ने गलत जवाब दिया गया है।जिसकी जांच होना जरूरी हो गया है।
विनियमित हुए कर्मचारियों को महंगाई भत्ता भी नहीं दिया जा रहा है।
प्रभारी प्राचार्य की मनमानी से कर्मचारी परेशान हो रहे है।
यह भी चर्चा का विषय बना हुआ है कि प्रभारी प्राचार्य जबलपुर से प्रतिदिन गोटेगांव आना जाना करते हैं इसके बावजूद भी प्रभारी प्राचार्य के द्वारा आवास भत्ता के नाम से पैसा निकाला जा रहा है।
जबकि प्रभारी प्राचार्य सहित अन्य स्टाफ भी अप डाउन कर रहा है।शासन अंध मूक और बधिर बना हुआ है।
ठा. निरंजन सिंह महाविद्यालय की दुर्दशा,।
शिक्षा का मंदिर उपेक्षा का शिकार होता जा रहा है इसका परिदृश्य ऐसा है कि देखते ही बनता है।अपने कर्तव्यों पर हंसी उड़ाता प्रतीत हो रहा है।
जिम्मेदार-लापरवाह सरकार की शिक्षा प्रणाली पर उठे सवाल।
क्षेत्र में चर्चा का विषय नगर का इकलौता कालेज शासकीय ठाकुर निरंजन सिंह महाविद्यालय इन दिनों गंभीर अव्यवस्थाओं और प्रशासनिक लापरवाही की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है। अंधे पीसे कुत्ते खाएं वाली कहावत चरितार्थ होती जा रही है।जहां एक ओर सरकार “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ”, “शिक्षित भारत” जैसे नारे बुलंद कर रही है, वहीं दूसरी ओर यह महाविद्यालय शिक्षा के साथ मज़ाक बनकर रह गया है। संबंधित जनप्रतिनिधि अधिकारी अपनी जिम्मेदारी भूलकर गहरी नींद में सोए हुए हैं जिसके चलते शिक्षा का मंदिर अब अपनी दुर्दशा के आंसू बहा रहा है जिसके अभाव में अब विद्यार्थियों का भविष्य अंधकार में होता जा रहा है। जिससे सरकार की शिक्षा प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
शौचालय की हालत शर्मनाक: फैली दुर्गंध
महाविद्यालय के शौचालय की स्थिति मानव गरिमा को ठेस पहुँचाने वाली है। फर्श उखड़े हुए हैं, दीवारें गंदी और सीलनभरी हैं, और छत से प्लास्टर झड़ रहा है। छात्र-छात्राएं इन शौचालयों का उपयोग करने से भी कतराते हैं, जिससे स्वास्थ्य पर भी खतरा मंडरा रहा है।
राशि निकलती रही, हालात बिगड़ते रहे:
विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, हर वर्ष महाविद्यालय प्रबंधन के नाम पर लाखों रुपये खर्च किए जाने का दावा किया जाता है। लेकिन स्थिति इसके बिल्कुल उलट है। कहीं कोई मरम्मत, रखरखाव या सफाई के नाम पर कार्य नहीं हुआ। सवाल यह है कि आखिर ये राशि कहाँ जा रही है?
प्रोफेसर और प्राचार्य: समय पर नहीं, समर्पण
यह भी सामने आया है कि प्राचार्य से लेकर जबलपुर से आने वाले अधिकांश प्रोफेसर समय से कॉलेज नहीं पहुँचते। देर से आना और जल्दी लौट जाना यहाँ की आदत बन चुकी है। इस लापरवाही का खामियाजा छात्रों को भुगतना पड़ रहा है, जिनकी पढ़ाई लगातार प्रभावित हो रही है।
महाविद्यालय की छवि पर गहराहा संकट:
दीवारों की सीलन, टूटी छत, गंदे शौचालय और अव्यवस्थित कक्ष — ये सब ठाकुर निरंजन सिंह महाविद्यालय की छवि को धूमिल कर रहे हैं। यदि जल्द सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो किसी बड़े हादसे की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
स्थानीय जनता और छात्रों की मांग: बढी मांग
अब समय आ गया है कि उच्च शिक्षा विभाग, जनप्रतिनिधि और प्रशासन इस उपेक्षित महाविद्यालय की सुध लें। भ्रष्टाचार और लापरवाही की जाँच हो, राशि का लेखा-जोखा सार्वजनिक हो और कॉलेज को फिर से एक आदर्श शैक्षणिक संस्थान के रूप में स्थापित किया जाए।
: जनभागीदारी कर्मचारियों का नहीं हो रहा मानदेय
सूत्रों के अनुसार गोटेगांव विधायक द्वारा लगाए गए प्रश्न का गलत जवाब प्रभारी प्राचार्य द्वारा दिया गया है।
विनियमित हुए कर्मचारियों को नहीं दिया जा रहा महंगाई भत्ता।
प्रभारी प्राचार्य के मनमानी से कर्मचारी परेशान
: प्रभारी प्राचार्य द्वारा आवास भत्ता के नाम से निकाला जा रहा है पैसा ।
जबकि प्रभारी प्राचार्य सहित अन्य स्टाफ कर रहा अपडाउन
: (1) विनियमित हुए कर्मचारियों को मानदेय पर वर्तमान महंगाई भत्ता नहीं दिया जा रहा है। शासन के आदेशों की अवेहलना प्राचार्य की हठधर्मिता को प्रदर्शित करती है। जिससे कर्मचारियों में नाराजगी व्याप्त है।
(2) प्रभारी प्राचार्य महाविद्यालय में सक्षम और अधिकारी साबित नहीं हो पा रही है जिससे महाविद्यालय गर्त में जाने को तत्पर है।
(3) महाविद्यालय में न ही बच्चों की कक्षाओं का सुचारू रूप से संचालन हो पा रहा है। ओर न ही बच्चों को सुख सुविधाएं मिल पा रही है। बच्चों के द्वारा विकास के नाम से फीस लेना और फिर न हीं उन बच्चों को सुविधाएं देना। यह एक बड़े घोटाले को सूचित करता है।
(4) महाविद्यालय में लगभग 2000 के करीबन बच्चे शिक्षा ग्रहण करने जाते है लेकिन महाविद्यालय में एक भी शौचालय नहीं है। जो है उनके लिए लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों द्वारा निरीक्षण में बताया गया कि ये जर्जर स्थिति में हैं। इस एरिया को सूचना के माध्यम से बच्चों के इस तरफ न आने दिया जावे। लेकिन प्राचार्य के द्वारा इस पर भी कोई कार्यवाही नहीं की जा रही है।अगर कोई दुर्घटना हो जाय तो इसका कौन जवाबदार है!
(5) गोटेगांव के विधायक द्वारा विधानसभा में प्रश्न लगाया गया था जिसमें पूछा गया था कि शासन के आदेशानुसार विनियमित हुए कर्मचारियों को क्या वर्तमान दर से महंगाई भत्ता दिया जा रहा है कि नहीं जिसका जवाब प्राचार्य द्वारा गलत जानकारी तैयार कर शासन को भी भेज दिया गया है। जिसकी उचित जांच होना चाहिए ।
(6) प्रभारी प्राचार्य के द्वारा जबलपुर से गोटेगांव अपडाउन भी किया जाता रहा है।जिसकी जानकारी उच्चाधिकारियों को भी लेकिन कोई कार्यवाही नहीं की जाती है।लगता है सभी में इनका खौफ है या डर लगता है।
लेकिन आवास भत्ता के नाम पर पूरी राशि निकाल ली जाती। राशि निकलने का ऐसा फर्जीवाड़ा विगत वर्षों से लगातार अपने साथ साथ सभी नियमित कर्मचारियों को इसका फायदा मिलता है।
(7) अतिथि विद्वान एवं शिक्षकों पर लापरवाह प्राचार्य की विशेष मेहरबानी है। प्राचार्य के द्वारा इन शिक्षकों पर कोई दबाव नहीं है न ही इनके द्वारा कोई कक्षाएं ली जाती है। लोकल का जो स्टाफ है ये सार्थक ऐप में बस उपस्थिति लगाने आते हैं सुबह ओर शाम ओर इनको पूर्ण वेतन देने की इनको पात्रता है।
(8) प्राचार्य के पतिदेव के मार्गदर्शन महाविद्यालय का संचालन किया जा रहा है।
(9) महाविद्यालय का भवन जर्जर हो रहा है आय दिन लेंटर की छाप पोर्च में कही बाथरूम में कही गैलरी की गिर रही है। महाविद्यालय प्रबंधन इस पर कोई कार्य नहीं करवा रहा है।अगर कोई अनहोनी होती है तो इस पर कौन जिम्मेदारी लेगा।
उच्च शिक्षा विभाग के कर्णधार और जवाबदार अधिकारी इस ओर शीघ्र ध्यान दें।



