साहित्य दर्पण
बरसाती हवाएँ

ये बरसा हवाएँ
धधकती गर्मी से,
ऐसे राहत दे जाए
जैसे
प्यासे को पानी।
ये बरसाती हवाएँ
गर्मी के घमंड पर
ऐसे प्रहार करती
जैसे
वामन और राजा बली।
ये बरसाती हवाएँ
मेघों को साथ लिए चलती
हवा में नमी घोलती
जैसे
जिंदगी में श्रृंगार रस ।
ये बरसाती हवाएँ
बीच बीच में अपना
अल्हड़ रूप दिखाती
रूक जाती कभी कभी तो
उमस आँख दिखाती।
ये बरसाती हवाएँ
खोया हुआ कोई वस्तु लौटती
जैसे
एक अरसे बाद चैन की सांस।
सुनीता कुमारी
पूर्णियाँ, बिहार।



