साहित्य दर्पण

कुछ जाने अंजाने रिश्ते

बड़े खूबसूरत थे वो एहसास ,
चांदनी रात में चांद को देखकर,
जब अधरों पर छा जाती थी मुस्कान।

अनायास ही दिल ,
खुश होकर गुनगुनाने लगता था ,
मानो खयालों में कोई चेहरा उसे लुभाने लगता
था।

मध्यम-मध्यम सी पवन का चलना,
एक तरंग से छेड़ जाता था ज़हन में,
खुद को लोगों की नजरों से छुपाना मुश्किल लगता था।

वो लड़ना रूठना और मनाने का इंतजार करना,
तिरछी नजर से देख कर उसकी राह तकना, उसके बढ़ते कदम पर धड़कनों का बढ़ जाना।

हो नजर से जो ओझल वो चेहरा,
बंद कर पलकों को उसे करीब बुलाना,
खयालों में ही सही उसके संग वो वक्त बिताना।

सावन की बूँदों सा उसका छू कर जाना ,
बनकर खुश्बू उसका सांसों में बस जाना,
सोच उसके बिना जिंदगी को अश्क बहाना।

कुछ अनजाने रिश्तो में मानों सब कुछ पा जाना,
देख एक नजर उसे तितलियों सा इठलाना ,
बिना मतलब चिड़ियों का यूँ चहचहाना।

सच बड़ा खूबसूरत था वो गुजरा जमाना,
खयालों में भाता था जब वक्त बिताना,
छोटी-छोटी निशानियां को सहेज दिल में छुपाना।

दूर हर बुराई से वो जिंदगी बिताना,
दोस्तों से बयां कर हाल-ए-दिल वह नजरें चुराना,
खुल जाए ना राज दिल के सोच हौले से शरमाना।।

पूनम शर्मा स्नेहिल

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