संपादकीय/लेख/आलेख

व्यंग्य: अखबार का निधन काँलम  

अखबार में अब बस एक ही जीवित काँलम बचा है और वह है निधन काँलम | पूरे समाचार पत्र में बस यही एक विश्वसनीय समाचार होता है , यही एक मात्र ऐसी खबर होती है जिसकी  सत्यता पर शक नहीं होता है , जिसमें रत्ती भर भी अफवाह नहीं होती है | अखबार में बस यही एक ऐसा समाचार होता है जो किसी पार्टी के समर्थन या विरोध में नहीं छपा होता है | निधन के समाचार ने पत्रकारिता को मरने नहीं दिया | समाचार पत्रों की दुनियां में कितने किस्म के काँलम आरंभ हुए और फिर उनका अंत हो गया लेकिन निधन का काँलम आज तक जीवित है और अनंतकाल तक जीवित रहेगा , इस बात को इस तरह भी कहा जा सकता है कि अखबार में जगह पाकर निधन अमर हो गया | मै यह बात दावे के साथ कह सकता हूँ कि जिस दिन   समाचार पत्र में से निधन का काँलम हट जायेगा उस दिन पत्रकारिता मर जायेगी |

ऐसे बहुत से लोग है जो अखबार हाथ में लेते ही सब से पहले निधन का काँलम पढ़ते है , बल्कि उसमें निधन का काँलम है इसीलिये अखबार पढ़ते है , अखबार हाथ में निधन वाला पृष्ठ ऐसे खोजते है मानो निधन के लिये ही जीवित है | मेरे पड़ोसी भी निधन प्रेमी है ये अखबार खरीदते ही सिर्फ़ निधन के समाचार पढ़ने के लिये है | यह महाशय उसी समाचार पत्र को श्रेष्ठ मानते है जिसमें अधिक से अधिक लोगो के निधन की सूचना हो | अगर किसी दिन मात्र दो तीन लोगो के निधन की सूचना होती है उस दिन इन्हें अखबार पढ़े जैसा लगता ही नहीं |

जब ये अखबार लेने बुक स्टाल पर जाते है तो दुकानदार पूछता है – कौन सा अखबार दू ? तब पड़ोसी कहते है – जिसमें अधिक से अधिक मरने वालों की सूचना हो | कई वर्षो से यह सिलसिला चल रहा है दुकानदार का प्रश्न और पड़ोसी का उत्तर एक जैसा रहता है अगर कुछ बदलता है तो अखबार बदलता है |

पड़ोसी तो इतने अधिक निधन प्रेमी है कि वे पिछले कई वर्षो से निधन काँलम की कटिंग को बकायदा दिन , तारीख़ और सन के अनुसार जमा करते आ रहे है उनका लक्ष्य निधन समाचार पढ़ने में विश्व रिकार्ड स्थापित करना है | उनकी मान्यता है कि जब हम किसी के निधन की सूचना पढेगे तभी तो कोई हमारे निधन की सूचना पढ़ेगा , भाई ताली दोनों हाथो से बजती है | एक प्रकार से देखा जाये तो वे निधन काँलम में स्थान पाने के लिये मरे जा रहे है | उन्होंने तो अपने बेटे को वसीयत की है कि मेरे मरने पर मेरी आत्मा की शांति के लिये भले कोई धार्मिक आयोजन नहीं करना लेकिन मेरे मरने की खबर अखबार में ज़रूर छपवाना वरना मेरी आत्मा समाचार पत्रों के दफ्तर में भटकती रहेगी |

पड़ोसी जी के अखबार में छपने की तड़प का एक कारण यह भी है कि मेरे पड़ोसी कवि भी है इन्होने अपनी अनेको रचनाये समाचार पत्रों में छपने के लिये भेजी थी चूकि ये किसी सरकारी महकमे में बड़े अधिकारी नहीं थे इसलिये इनकी रचना को कभी अखबार के पृष्ठों पर जगह नहीं मिली | संपादक भेजी हुई पोस्ट नहीं देखता बल्कि यह देखता है कि पोस्ट भेजने वाला किस पोस्ट पर है | पहले कवि किसी पोस्ट पर पहुचे फ़िर संपादक के पास उसकी पोस्ट पहुचे तब ली जाती है पोस्ट हाथो हाथ | संपादको को तो अपने पत्र के साहित्यिक पृष्ठ पर लगातार यह सूचना प्रकाशित करते रहना चाहिये कि ‟ हमारे यहाँ केवल उच्च पदों पर आसीन प्रशासनिक अधिकारियों की ही रचनाये स्वीकारी जाती है ” | अरे भाई मेरे अगर आप दावा करते हो कि आपका अखबार देश का एकमात्र सब से अधिक पढ़ा जाने वाला अखबार है तब तो यह बात और ज़्यादा ज़रूरी हो जाती है कि आपकी नीति स्पष्ट और सार्वजनिक हो |

हिंदी समाचार पत्र में निधन की खबर ही एक मात्र ऐसी खबर होती है जो हिंदी में ही लिखी जाती है , अखबार का यही एक मात्र ऐसा स्थान है जहां अंग्रेज़ी शब्द का इस्तेमाल नहीं होता है वरना हिंदी के समाचार पत्रों में अंग्रेज़ी इतनी अधिक होती है कि अंग्रेज़ी के शिक्षक अपने छात्रो से कहते है कि अंग्रेज़ी सीखना है तो हिंदी के अखबार पढो |

पड़ोसी के घर का सुबह का वातावरण तो निहारने लायक होता है | एक हाथ में चाय का कप और एक हाथ में अखबार , कमरे में मेहदी हसन की गज़ल बज रही है और पड़ोसी चाय की  चुस्की के साथ निधन के समाचार पढ़ रहे है | पढ़ते पढ़ते खुश हो रहे , मुस्कुरा रहे है , टोस्ट और बिस्किट की फ़रमाईश कर रहे है क्योकि निधन के समाचार में एक भी इनका अपना नहीं है |

 

अखतर अली
निकट मेडी हेल्थ हास्पिटल
आमानाका , रायपुर ( छत्तीसगढ़ )
मो.न. 9826126781

 

 

 

 

 

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button

You cannot copy content of this page

situs nagatop

nagatop slot

kingbet188

slot gacor

SUKAWIN88