साहित्य दर्पण
कुछ इंतहा

वफा के वादे न किए तो क्या?
जीवनभर साथ न निभाया तो क्या?
आई जब याद फिर भी पुकारा नहीं तो क्या?
गुजरा वक्त भुला दिया
तो क्या?
कभी भी सोचा नहीं संजीदगी से तो क्या?
जिंदगानी के हसीन पलो को भुला दिया तो क्या?
वो मुलाकातों के मायने आज कुछ नहीं तो क्या?
वो नगमे जो गाए मैंने उन्हें भुला दिया तो क्या?
वो इंकार व इकरार के सुहाने पल भुला दिए तो क्या?
पर एक बात बताऊं अगर खफा न हो,
जो वादा करे पर वफा ही न हो वो इंसान ही क्या?
जयश्री बिर्मी
अहमदाबाद



