साहित्य दर्पण

तुम स्वर्ग की गंगा हो…”

सपनों के नींदों से पलक़ चुराना चाहता हूं ।
तुमको तुम ही से बेशक़ चुराना चाहता हूं ।।

चेहरे पर मुस्कुराती हुई वो रुतबा देखकर ,
वो मुस्कुराहट भरी चमक चुराना चाहता हूं ।

बेशक़ मेरे नाम से नहीं धड़कता होगा दिल ,
खामोश धड़कन की धड़क चुराना चाहता हूं ।

तुम मिल जाओ तो जन्नत की जरूरत क्या है ,
खनकती चूड़ियों की खनक चुराना चाहता हूं ।

तुम जो चांद बनकर मुस्कुरा रही हो फलक़ में ,
वो खुला सा धुला सा फलक़ चुराना चाहता हूं ।

बेख़ौफ़ जो घूम रही हो शामों सहर शहर में ,
तुम्हारे पांव तले की सड़क चुराना चाहता हूं ।

अपना भी कहती हो व दीवाना भी कहती हो ,
अपनापन दीवानगी का हक़ चुराना चाहता हूं ।

शब्दों के जाल में फंसाने की कोशिश हमेशा ,
फसाने अफसाने का सबक चुराना चाहता हूं ।

तुम स्वर्ग की गंगा हो जिसे मंदाकिनी कहते हैं ,
मन में उफनती हुई वो क़सक़ चुराना चाहता हूं ।

सपनों के नींदों से पलक़ चुराना चाहता हूं ।
तुमको तुम ही से बेशक़ चुराना चाहता हूं ।।

स्वरचित एवं मौलिक
मनोज शाह ‘मानस’
नई दिल्ली-110015
मो.नं.7982510985

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