साहित्य दर्पण
गलती का अहसास

गलती का अहसास, उसे भी होता होगा,
अकेले बैठ वो, मेरी यादों में रोता होगा।
उम्र भर की मेरी नींद, छीन ली जिसने,
रात को वो भी, क्या चैन से सोता होगा।
याद कर-कर के मेरी, वफा को अक्सर
वो दामन को, अश्को से भिगोता होगा।
रोशनी भी अब रास, उसको नहीं आती
अन्धेरों में अब खुद, को खोजता होगा।
एक अरसे से निकला नहीं है वो घर से,
दर्द के धागे में, आँसू को पिरोता होगा।
मेरा नाम कभी, हाथ पे लिखा था उसने
रो, रो के उस, तहरीर को धोता होगा।
दिल तोड़ के, मिलता है क्या खुदा जाने
ज़िन्दगी से वो, जरूर कुछ खोता होगा।
ये वो गुनाह है, जो माफ भी नहीं होता,
तमाम उम्र वो, इस बोझ को ढोता होगा।
-रेखा घनश्याम गौड़
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