साहित्य दर्पण

आई मतवाली वर्षा ऋतु

गीत

नदिया हिलोर करती,
मंद-मंद पवन चलती ।

बूँद-बूँद है बरसती,
सरिता,सागर बनती,
डाबरों के पानी में-
चिरैया छप-छप करती ।

बचपन हर्षित करती,
लहरों पे इठलाती,
है कागज़ की कश्ती-
तूफ़ाँ से लड़ जाती ।

टप-टप है छत टपकती,
माँ नयन अश्रु भरती,
चिंता सबकी सताती,
माँ चूल्हा सुलगाती ।

ये सबकी पीर हरती,
खुशियों से घर भरती,
चेहरों को खिलाकर-
ख़ुद क्यों उदास रहती ।

अवनि से व्योम मिल रहा,
मेघ संग रवि खेल रहा,
हाथ आती नहीं धूप-
सूरज ठेंगा बता रहा ।

घन छाए श्यामल घटा,
प्रकृति बिखेरे अनुपम छटा,
वसुंधरा ओढ़े पीत वसन –
ज्यों भानु से जलद हटा ।

खेतों में फ़स्ल लहराई ,
अधर मुस्कान छाई,
रवि खेले छुपमछाई,
धूप ऑंगन सुस्ताई।

🪴नलिन खोईवाल , इंदौर

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