संपादकीय/लेख/आलेखसाहित्य दर्पण

नेकी

नेकनामी को हमेशा ही सराहा गया हैं ,चाहे धर्म में हो या समाज में हो।नेक इंसान का हमेशा ही मान सम्मान होता हैं।समाज में भी एक अच्छा दरज्जा मिलता हैं और इज्जत भी।इंसानियत एक उम्दा चरित्र की निशानी हैं,जो आदमी को चरित्रवान बना उसे एक ऊंचाई की और ले जाता हैं। अच्छाई इंसान का एक ऐसा गुण हैं जिससे समाज में आदमी की इज्जत बढ़ता हैं। समाज में ऊंचा स्थान पता हैं।एक पूछ बनती हैं और एक पद मिलता हैं आदमी को अपने समाज में।किंतु कुछ लोग नेकी को छोड़ बेईमानी और धूर्तता को पसंद करते हैं।अपने धन के मद में धुत्त रह दुनियां को कमतर ,तुच्छ समझते हैं।ऐसे लोगों को कर्म का फल अवश्य मिलता हैं लेकिन कभी कभी उनको ,उनके ही अपनों के कर्म बचा लेते हैं ये यह कहानी में दर्शाया है–
एक बहुत बड़ा सेठ था , उस जमाने में भी लाखो का व्यापार था,भगवान का दिया सब कुछ था।भरा पूरा घर जो दरिया के पास था, जहां से उसे जहाज से आना जाना आसान रहता था ,वही लंगर डाल सकता था।उसके पास सब कुछ था, धन–दौलत,जवाहरात, नौकर– चाकर जो पैसा खरीद सकता था।महिनों जहाज़ में समान भर विदेश व्यापार करने जाता और वापस घर आता तो घन वैभव में बढ़ोतरी ही होती थी ।अभिमानी सेठ में नेकी का तो नाम भी न था,अपने को सर्वोत्तम मानने वाला अहंकारी भी था।
ऐसे सेठ की पत्नी खूब धर्माचारिणी थी,दिन धर्म में दिन बीतता था।प्रभु भजन सदाचार और नेकी की मूरत थी।उसे ने बचपन से अपनी मां को ये सब करते देखा था तो वही संस्कार उसमे भी भरे पड़े थे। मां को दान धर्म करते देखने वाली वह भी खूब दान धर्म करना चाहती थी किंतु घमंड से उन्ममत्त पति के रोकने पर वह नहीं कर सकती थी।उनके घर में रोज ही गाय और कुत्ते को रोटी डाली जाती थी,लेकिन उसका पति उसे व्यय समझ उसे रोटी डालने के लिए मना कर दिया करता था।मन से वह दुःखी रहती थी।एक बार अपनी मां से मिलने गई तो मन की व्यथा बता रो पड़ी।उसकी मां ने बताया जो तू गाय और कुत्ते को रोटी डालना चाहती हैं वह घरके पास दरिया में डाल दिया कर तुझे भी मानसिक संतोष रहेगा और पति की बात भी रह जायेगी। और उसने रोटियां दरिया में डालनी शुरू कर दी। ऐसे कई साल चलता रहा । एक बार सेठ खूब कमाकर जहाज़ में जवाहरात और रत्नों को भर आया था,जैसे ही दरिया में जहाज पहुंचने वाला था ,दरिया का पानी उठने लगा ,थोड़ी देर में दरिया में पानी का खूब उफान आया , जहाज़ कभी भी डूब सकता था खुद की जान भी खतरे में थी।मुसीबत के मारे ने भगवान को भी याद किया लेकिन कुछ नहीं हो पाया काफी देर मुश्शकत के बाद भी बचने की कोई उम्मीद न दिखाई देती थी।किंतु थोड़ी देर बात एक छोटे से टीले जैसी जगह पर जहाज रुक गया।काफी देर ऐसे ही बैठे रहने के बाद पानी उतरने लगा और जहां उसका जगाई रुका था वह टीला और कुछ नहीं उसकी पत्नी ने जो रोटियां दरिया में डाली थी वह एक जगह जमा हो टीले सा बन गया था,जिसने उसकी जान ,जहाज और दौलत को बचाया था।
तभी से कहावत बनी –
–नेकी कर दरिया में डाल–

जयश्री बिर्मी
निवृत्त शिक्षिका
अहमदाबाद

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