संपादकीय/लेख/आलेखसाहित्य दर्पण

नर नारी पूरक या हरिफ़

रब ने नर और नारी काr सर्जन पूर्णता के लिए किया हैं।जो जैविक चक्र को पूरा करने के लिए, दुनियां में जीवन के लिए जरूरी ही था। जीवन चक्र चलाने के लिए दोनों ही आवश्यक थे, हैं और रहेंगे। दोनों का ही कोई पर्याय नहीं है।आदि मानव की जिंदगी कम एहसासों वाली और संघर्षमय थी,संसाधनों की तो बात ही न थी,घर या बसेरा नहीं था, बस जहां खाना और पानी मिला वहीं बस जाया करते थे।धीरे धीरे आविष्कारों की वजह से जिंदगी में थोड़ी सरलता आई,जीना थोड़ा आसान हुआ और धीरे धीरे आज की आरामदेह जिंदगी आई। जहां पहले वाला शारीरिक संघर्ष कम हो गया।
लेकिन मानसिक संघर्ष में वृद्धि हो गई।कुछ साल पहले मर्द आर्थिक कार्य करते थे व औरते गृहकार्य, दोनों ही एक दूसरे के कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप कम ही करते थे,तो दोनों एक प्रकार के अनुकूलन से जीते थे।
दोनों में तू तू मैं मैं कम होने की वजह से घर में शांति बनी रहती थी। समझदारी का माहोल रहता था घर में, जिससे घर के अन्य सभ्यों को भी शांति मिलती थी , वाद विवाद से दूर आपस में सामनज्यस से रहते थे।एक समर्पण की भावना थी।महंगाई कहो या जरूरतों के बढ़ने से कहो लेकिन
अब जब स्त्रियां भी आर्थिक क्षेत्र में उतरने लगी हैं,तो समकक्षता दिखने लगी हैं।वैसे महंगाई के जमाने में आर्थिक सद्धरता पाने के लिए स्त्री का आर्थिक प्रवृत्ति करना जरूरी बनता हैं,उससे उसका भी सर्वांगी विकास होता हैं और साथ में आर्थिक हालत भी घर के ठीक हो जाते हैं।छोटी छोटी कमियों से घर में जो तनाव होते थे वह कम हो जायेंगे ये भी सही हैं लेकिन मानसिक तनाव बढ़ जाते हैं।रथ के दो पहिये जो अपने अपने काम में माहिर थे वह एकदूसरे के काम में दखल देने लगे और आपस में विवाद खड़े होने लगे ,स्त्री जो परिवार का एक अंग थी वो दो जगहों में बंट गई ,दोनो जगह की कार्यक्षमता भी बंट गई, जिससे एक अनजान सा अधूरापन सा आ गया, जिससे एक असंतोष घर करने लगा और पारिवारिक शांति नष्ट होने लगी।कई बार जुदाई और उसके बाद तलाक तक की नौबतें आने लगी।
क्या नर और नारी जो एकदूरे पूरक होना सही हैं या हरिफ?

जयश्री बिरमी
निवृत्त शिक्षिका
अहमदाबाद

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