पितृपक्ष : अपने पूर्वजो को स्मरण और उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञपित करने का पर्व


आलेख – गौरव शर्मा
पितृपक्ष पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने, उनका स्मरण करने तथा उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का महापर्व है। प्रत्येक वर्ष आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि को जब सूर्य कन्या राशि में आते है तब पितृपक्ष शुरू होता है और यह अमावस्या तक रहता है। ये 15 दिन पूरी तरह से पितरों को समर्पित माने जाते हैं। पंद्रह दिन तक मनाए जाने वाले इस पर्व को लेकर ऐसी मान्यता है कि इन दिनों हमारे पूर्वज पिंडदान व तिलांजलि की आशा से पितृलोक से पृथ्वी लोक पर अपने परिजनों के समीप विविध रूपों में आते हैं और अपने मोक्ष की कामना करते हैं। इसलिए श्रद्धों को पितरों का पर्व भी कहा जाता है। परिजनों से संतुष्ट होने पर पूर्वज आशीर्वाद देकर हमें अनिष्टों से बचाते हैं।
वेदों और पुराणों के अनुसार मानव पर तीन प्रकार के ऋण माने गए है – पितृ ऋण, देव ऋण, तथा ऋषि ऋण। इसमे पितृ ऋण को सर्वोपरि माना गया है। शास्त्रों के अनुसार मृत्यु के चार वर्षो के उपरांत पितरों का श्राद्ध पक्ष में श्राद्ध करने का विधान है। पितृपक्ष के पंद्रह दिनों तक ब्रह्मचर्य पालन करना चाहिए और इस दौरान मांसाहारी भोजन से परहेज करना चाहिए। इसके अलावा श्राद्ध करने वाला अगर इन पंद्रह दिनों में प्रतिदिन स्नान करके चावल, तिल, जौ व पानी लेकर पीपल के पेड़ को चढ़ाए तो पितरों के कर्ज से मुक्ति मिल जाती है। श्राद्धों के दौरान जो भी किया जाता है, उसे पितरों के लिए माना जाता है। यही कारण है कि लोग इन 15 दिनों में बढ़-चढ़कर दान-पुण्य करते हैं।
गरुड़ पुराण में भगवान विष्णु और उनकी सवारी व अनन्य भक्त गरुण के मध्य संवाद है जिसमे जीवात्मा की मृत्यु के बाद की स्थिति का उल्लेख है। पुराण में बताया गया है कि जिस भी घर में उसके किसी स्नेही स्वजन कि मृत्यु होती है तो उस घर में 12 दिन तक मृत व्यक्ति की आत्मा परिवार के बीच रहती है। शास्त्रों में कहा गया है की गरुण पुराण के श्रवण करने से वह आत्मा मोह से मुक्त होकर सद्गति प्राप्त करती है।
गरुण पुराण के अनुसार,आपके पूर्वज की जिस तिथि में मृत्यु हुई है, पितृ पक्ष की उन्हीं तिथियों में पितरों का श्राद्ध किया जाता है। वायु पुराण, मतस्य पुराण, विष्णु पुराण तथा अन्य शास्त्रों जैसे मनु स्मृति में भी श्राद्ध कर्म के महत्व को बताया गया है। हिंदू धर्म में कर्म को प्रधानता दी गई है, इसलिए कहा गया है कि कर्म से ही मनुष्य पुत्र कहलाने का अधिकारी होता है। जो मनुष्य अपने पुत्र धर्म का पालन नहीं करता है उसे बेटा कहलाने का अधिकार नहीं है। गरुड़ पुराण के फलश्रुति अध्याय में बताया गया है कि पुत्र कहलाने का अधिकारी वही है जो पिता को मुक्ति दिलाने के कर्तव्य का पालन करता है। इसके लिए चार कर्म बताए गए हैं। इन चार कर्म को करने वाला ही पुत्र अथवा बेटा कहलाने का अधिकारी माना जाता है।
दक्षिण दिशा मृत्यु के देवता यम की मानी जाती हैं। वेदों में यम को पितरों का अधिपति माना गया हैं। यमराज जीवों के शुभाशुभ कर्मों के निर्णायक हैं। भगवान यम को पुराणों में सूर्य का पुत्र तथा न्याय के देवता शनि का अनुज माना गया है। किस्से और कहानियों में हमने अक्सर यह सुना है की यम अपने दंडपाश में आत्मा को यमलोक ले जाते है जहाँ उनके कर्मो के अनुसार उन्हे दंड दिया जाता है। यम लोक का उल्लेख कठोपनिषद ग्रंथ में मिलता है।
हमे चाहिए कि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को अपने पूर्वजों व पूर्वजों के स्मरण हेतु प्रतिवर्ष आने वाले इस पर्व कि महत्वता उन्हें बतलाएँ। जिससे वे ण केवल पर्व के महत्व को जाने बल्कि इस बात को भी भलीभाँति समझ सकें कि आज हम जो भी है या हमारा जो भी वजूद है वह केवल आर केवल हमारे अपने पूर्वजों की ही देन है।



