मिथ्या ? या अपनी और दृष्टि – सहजयोग

जबलपुर दर्पण। योग पाने की तपस्या में अनेक पढ़ाव आते हैं। सहजयोग की दृष्टि से भी देखें। बड़े आश्चर्य की बात है कि मानव, जितना कुछ मिथ्या है उसे कितने जोर से पकड़ लेता है और सत्य को पकड़ने में कितना कतराता है, जितनी जल्दी मिथ्या हमारे अंदर से मिटता जाता है उतने ही जल्दी हम लोग चित्त को हल्का कर लेते हैं, सहजयोग में यही चित्त परमेश्वर से जाकर मिलता है, यही चित्त वो सर्वव्यापी परमेश्वर के प्रकाश में जाकर मिल जाता है, सहजयोगी की पहचान एक ही है कि आप कितने आनंद में उतरे हैं, आप कितने शान्ति में उतरे हैं, आप कितने प्रेम में उतरे हैं, मिथ्या में रहने वाले लोग सहजयोग को प्राप्त नहीं कर सकते हैं। जैसे राखहुं तैसे ही रहूँ, सहजयोगी अगर इतना करलें कि जैसे भी रखो मंजूर है हमें, हरेक चीज में, परिस्थिति में आनंद आ सकता है। परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी के प्रवचन से साभार 21 दिसम्बर 1975



