दमोह दर्पणमध्य प्रदेश

श्रीकृष्ण-सुदामा मिलन के साथ भागवत कथा का समापन

संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा रैकवार परिवार तत्वावधान में बटियागढ़ के घनश्यामपुरा में चल रही सात दिवसीय कथा हवन-पूजन के साथ हुआ समापन

रिपोर्ट विनोद उदेनिया खबर बटियागढ़ से


अंतिम दिन बालव्यास पं. ऋषिकांत गर्ग महराज स्वामी जी ने सुदामा चरित्र एवं भगवान श्रीकृष्ण कथा विश्राम प्रसंग सुनाकर श्रोताओं को भाव विभोर कर दिया। कथा के दौरान स्वामी जी ने धर्म का पाठ पढ़ाया। कथा सुनने काफी श्रद्धालु पहुंचे थे।
कथा का शुभारंभ एक ही गुरु के शिष्य रहे भगवान कृष्ण और सुदामा की मित्रता के प्रसंग से हुआ। स्वामी जी ने बताया कि भगवान की कृपा हर भक्त को समान रूप से मिलती है। भगवान राजा और रंक में कोई भेद नहीं करते। भगवान के बाल सखा सुदामा गरीब थे। लेकिन उनका एक-दूसरे के प्रति गहरा प्रेम और समर्पण था।
कथावाचक ने भगवान के प्रति भक्ति में ऐसा ही समर्पण लाने की बात कही। उन्होंने गृहस्थ धर्म का पालन करने की सीख देते हुए कहा कि गृहस्थी में रह कर अपने कर्तव्यों को पालन करने के साथ ही भगवत भक्ति करनी चाहिए। भगवान की भक्ति के लिए वानप्रस्थ या संन्यास जरूरी नहीं है। गृहस्थ में रहते हुए भी भौतिक मोह माया से निर्लिप्त रह कर भक्ति करने की कला अपने आप में बड़ा योग है। कहा कि मनुष्य अगर काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईष्र्या, द्वेष आदि से स्वयं को बचा लेता है तो उसका उद्धार हो जाता है। लेकिन इन बुराइयों से बचने के लिए गुरु का आश्रय लेना जरूरी है। सद्गुरु ही भगवत प्राप्ति का सहज मार्ग बताने में सक्षम हैं।
स्वामीजी ने कहा कि श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध के 29वें अध्याय से 33वें अध्याय तक रास पंचाध्यी के हैं। इसमें भगवान श्रीकृष्ण ने पिछले जन्मों की उन संतों की इच्छा को पूर्ण किया, जो इस जन्म में गोपियां बन कर आई हैं, क्योंकि राम अवतार में भगवान मर्यादा पुरुषोत्तम बनकर आए थे। इससे वे संतों की प्रेम करने की इच्छा को पूर्ण नहीं कर पाए थे। परंतु इस जन्म में समस्त सृष्टि को प्रेम का रसास्वादन कराने आए हैं। महाराज ने गोपी गीत पर बड़ा सुंदर उपदेश दिया।
कथा के अंतिम दिन सुदाम-कृष्ण मित्रता संबंधित आकर्षक झांकियां निकाली गई। कथा के बीच-बीच में संगीतमय प्रवचन और भजन की प्रस्तुति होती रही। इसी प्रकार श्रोताओं ने फूलों की सुंदर होली खेली।
बटियागढ़ के घनश्यामपुरा में संगीतमय श्रीमद्भागवत ज्ञान यज्ञ सप्ताह 28 फरवरी 2022 से 6 मार्च तक कथा का श्रवण कथा श्रौता श्रीमती राधारानी भागीरथ प्रसाद रैकवार के द्वारा किया जा रहा था। एवं कथा व्यास बालव्यास पं. ऋषिकांत गर्ग जी महराज के मुखारविंद से सभी श्रद्धालुओं को कथा का रसपान कराया जा रहा था। कथा समापन के बाद हवन पूजन किया गया और कथा श्रौता ने संकल्प के साथ कथा व्यास बालव्यास पं. ऋषिकांत गर्ग जी महराज की विदाई की।

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