रोली मेमोरियल में चल रही रामकथा की अमृत वर्षा

सीधी जबलपुर दर्पण । रोली मेमोरियल सीधी में रामकथा के प्रथम दिन काकभुशुण्डि की स्वामि भक्ति को प्रकाशित करते हुए श्रीरामकिंकर विचार मिशन के अध्यक्ष स्वामी मैथिलीशरण जी ने कहा कि श्रीरामचरितमानस में नाम निष्ठा, रूप निष्ठा, धाम निष्ठा, लीला निष्ठा के द्वारा साधना के अनंत प्रकार बताये गये हैं।
साधना में प्रकारान्तर का तात्पर्य मत भेद न होकर एक निष्ठ होना है।स्वाद, प्रवत्ति, शैली, विचार, लक्ष्य इसमें भेद मनुष्य मात्र का गुण है। वस्तुत: यह भेद ही व्यक्ति और समाज की आवश्यकताओं को समाधान दे पाता है।
शिव, राम, विष्णु,कृष्ण, शालिग्राम, गणेश, देवी आदि अनेकों देवताओं के पूजा के विधान एक ईश्वर में निष्ठ होने के उद्देष्य से मनुष्य में सनातन भावना स्थापित करने के लिए की गई है। कहीं पर राम शिव की पूजा करते हैं तो कहीं शिव राम की पूजा करते हैं। सबको स्वीकार करना और उनके गुणों की स्थापना एवं उपयोग ही श्रीरामचरितमानस का प्रमुख लक्ष्य है।
मातु पिता गुरु गनपति सारद। सिवा समेत संभु सुक नारद।।
चरन बंदि बिनबउँ सब काहू। देहु राम पद नेह निवाहू।।
सबको प्रणाम करने का अर्थ है कि सबको सम्मान दें और उनसे आशीर्वाद रूप में रामभक्ति का बरदान माँग लें। स्वामी मैथिलीशरण जी ने कहा कि गुरु शिष्य से सीखें और शिष्य गुरु से सीखे यही ज्ञान के विस्तार का सूत्रात्मक प्रयोग तथा विधि है। काकभुशुण्डि शिव की महिमा बताते हैं और शिव काकभुशुण्डि की महिमा बताते हैं। पार्वती शंकर जी से कथा सुनकर उनकी प्रशंसा करती हैं और शंकर जी पार्वती जी की राम निष्ठा की प्रशंसा करती हैं। याज्ञबल्क्य को भरद्वाज जी के रामकथा विषयक प्रश्न में आनंद आया और भरद्वाज जी ने याज्ञबल्क्य को प्रणाम करके उनकी स्तुति की। जेहि कहत,गावत, सुनत, समुझत, परम पद नर पावही ।
कहा जाये तो समझा जाये, गाया जाये तो सुना जाये, तुलसीदास जी की वाक्योक्ति और उनकी कृति की प्रत्येक पंक्ति वेदोक्त है। जैसे वेद अखण्ड हैं उसी तरह तुलसीदास जी नानापुराण निगमागम से सम्मत हैं।
कथा में प्रमुख रूप से डा. राजेश मिश्र सांसद सीधी, डा. रामलला शर्मा, चन्द्रमोहन गुप्त, जवाहर लाल पाण्डेय, राममणि शुक्ल, बृजेन्द्र सिंह, आलोक सिंह, अभिमन्यु सिंह एवं सीधी नगर के प्रबुद्ध श्रोता उपस्थित रहे।



