उमरिया दर्पण

वैदिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय से होगा जल संरक्षण : विशेषज्ञ

सतीश चौरसिया उमरियापान । महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय, ब्रह्मस्थान करौंदी कटनी में “सतत भूजल उपयोग हेतु जल प्रबंधन – वैदिक काल से आधुनिज्ञक युग तक की यात्रा” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य शुभारंभ हुआ । इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलाधिपति वेद विद्या मार्तंड ब्रह्मचारी गिरीश चंद्र वर्मा जी द्वारा स्वचालित मौसम स्टेशन का लोकार्पण भी किया गया । यह संगोष्ठी विश्वविद्यालय तथा इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ हाइड्रोजियोलॉजिस्ट्स (आईएनसी-आईएएच) के भारतीय राष्ट्रीय चैप्टर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित की गई । कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन एवं गुरु पूजन से हुआ, जिसके बाद वैदिक मंत्रोच्चार और वेदपाठ ने वातावरण को आध्यात्मिक एवं प्रेरणादायक बना दिया । स्वागत उद्बोधन में कुलगुरु प्रो. प्रमोद कुमार वर्मा ने कहा कि वर्तमान समय में जल संरक्षण और भूजल प्रबंधन एक वैश्विक चुनौती बन चुका है । इस समस्या के समाधान के लिए वैदिक ज्ञान परंपरा और आधुनिक वैज्ञानिक पद्धतियों का समन्वय अत्यंत आवश्यक है । विषय प्रस्तावना प्रस्तुत करते हुए प्रो. बी.एस. चौधरी ने कहा कि भारतीय वैदिक साहित्य में जल को जीवन का मूल तत्व माना गया है । उन्होंने बताया कि प्राचीन ज्ञान परंपरा में जल संरक्षण के कई वैज्ञानिक और व्यावहारिक सिद्धांत मौजूद हैं, जिनका आधुनिक संदर्भ में अध्ययन बेहद महत्वपूर्ण है । मुख्य अतिथि कुलाधिपति ब्रह्मचारी गिरीश चंद्र वर्मा जी ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय संस्कृति में जल को ‘आपः’ कहकर देवतुल्य माना गया है । वैदिक ग्रंथों में जल संरक्षण और उसके शुद्ध उपयोग के अनेक निर्देश मिलते हैं, जो आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं । उन्होंने कहा कि यदि समाज वैदिक मूल्यों को अपनाए, तो जल संकट जैसी समस्याओं का समाधान संभव है ।
विशिष्ट अतिथि प्रो. ए.डी. सावंत ने चेतावनी दी कि भूजल का अत्यधिक दोहन भविष्य में गंभीर संकट उत्पन्न कर सकता है, इसलिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाते हुए सतत जल प्रबंधन की रणनीतियाँ विकसित करना आवश्यक है ।
अध्यक्षता कर रहे प्रो. ए.के. सिन्हा ने कहा कि जल संरक्षण केवल सरकार या वैज्ञानिकों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है । उन्होंने विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों से इस क्षेत्र में नवाचार और शोध को बढ़ावा देने की अपील की । कार्यक्रम के दौरान वरिष्ठ जल वैज्ञानिकों का सम्मान किया गया तथा विभिन्न प्रकाशनों का विमोचन किया गया, जिनमें शोध पत्र संकलन (स्मारिका), विश्वविद्यालय की त्रैमासिक पत्रिका ‘महर्षि वैदिक स्वर’, महर्षि विद्या मंदिर की वार्षिक ज्ञान पत्रिका और डॉ. रवि चौरे द्वारा लिखित पुस्तक ‘जल चौपाल’ शामिल हैं । अंत में प्रो. जे.पी. शुक्ला ने आभार व्यक्त किया । कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान के साथ हुआ । संगोष्ठी में देशभर से आए वैज्ञानिकों, प्राध्यापकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने भाग लिया । आगामी सत्रों में जल प्रबंधन, भूजल संरक्षण और वैदिक जल दर्शन पर विभिन्न शोधपत्र प्रस्तुत किए जाएंगे ।

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