पर्यूषण पर्व अंतिम दिन उत्तम ब्रम्हचर्य धर्म

आलेख : आशीष जैन (उप-संपादक) दैनिक जबलपुर दर्पण। मो. 9424322600

दसलक्षण पर्यूषण पर्व के दसवें एवं अंतिम अनंत चतुर्दशी के दिवस, सभी धर्मावलंबियों ने उत्तम ब्रम्हचर्य धर्म का पालन करते है। इस दिन जैन धर्म के बारहवें तीर्थंकर वासुपूज्य भगवान का मोक्ष कल्याणक महोत्सव भी होता है। साथ ही सोलह कारण धर्म पर्व, दशलक्षण धर्म पर्व, रत्नत्रय धर्म पर्व एवं चतुर्दशी पर्व के कारण यह दिवस अपने आप में विशेष महत्त्व रखता है। अनंत चतुर्दशी के बाद से क्षमायाचना पर्व क्षमा वाणी पर्व मनाया जाता है। उत्तम ब्रह्मचर्य हमें भौतिक संपर्क से जुडी हुये परिग्रहो का त्याग करना सिखाता है। जमीन पर सोना न कि गद्दे तकियों पर, जरुरत से ज्यादा किसी वस्तु का उपयोग न करना, व्यय, मोह, वासना ना रखते सादगी से जीवन व्यतित करना, जैनसंत इसका मन, वचन एवं काय से पालन करते है। ब्रह्म जिसका अर्थ आत्मा, और चर्या का अर्थ रखना होता है। इन दोनों को मिलाकर ब्रह्मचर्य बनता है जिसका मतलब अपनी आत्मा में रहना है।
काम भाव को मन, बचन, काय से परित्याग करके अपनी आत्मलीन होन ही ब्रह्मचर्य है। सभी इन्द्रियों में कामवासना एक ऐसा है जिसके हावी होने के कारण अन्य सभी इंद्रियों स्वतः प्रभावी हो जाती है।
ब्रह्मचर्य का मतलब अविवाहित होने से लिया जाता है, लेकिन यथार्थ में इसका मतलब है कि जब कोई संन्यास मार्ग पर चलने लगे तो अपना ध्यान ईश्वर और अपनी आत्मा से एक पल के लिए भी न हटाए। कोई भी बाधा उन्हें अपने मार्ग से हटा न सके, यही ब्रह्मचर्य है। श्रावक और श्राविकाओं के लिए ब्रह्मचर्य का अर्थ है, वे अपने साथी के प्रति समर्पित रहें। जैन धर्म में यौन इच्छाएं पाप कर्मों का बड़ा जरिया मानी गई हैं। धर्म प्रेम को बढ़ाता है, इच्छाओं और बंधन को नहीं। मोक्ष की ओर बढ़ने के लिए यौन इच्छाओं सहित सभी इच्छाओं और बाधाओं को दूर करना जरूरी है।
कामसेवन का मन से, वचन से तथा शरीर से परित्याग करके अपने आत्मा में रमना ब्रह्मचर्य है। शारीरिक ब्रह्मचर्य जैसे आलिगंन, चुम्बन, हाव-भाव एवं उपस्थेन्द्रिय के संचालन से प्रथक रहना है। और मानसिक ब्रह्मचर्य में वासना विषय का चिन्तन व सम्भोग आदि भावनाओं को पूर्णतयः त्याग देना है। ब्रह्मचर्य केवल क्रियात्मक रूप से ही नहीं, मन व विचारों में भी निरन्तर रूप से रहना चाहिए। ब्रह्मचर्य का तात्पर्य इच्छाओं के दमन से नहीं, अपितु मन में शुद्ध व सात्विक विचार-चिन्तन से मन को रति-विलास से हट कर नई दिशा देने से है। दसलक्षण धर्म पूजा में इसका विवरण मिलता है। जिसमें शील-बाढ़ नौ राख, ब्रह्मा भाव अंतर लखो। करी दोनों अभिलाख, करहु सफल नरभव सदा। उत्तम ब्रह्मचर्य मन आनो, माता बहिन सुता पहिचानो। सहे बान-वरषा बहु सुरे, टिके न नैन-बान लखि कुरे। कुरे तिया के अशुचि तन में, काम-रोगी रति करें। बहु मृतक सडहिं मसान माहीं, काग ज्यो चोच भरे। संसार में विष बेल नारी, तजि गए जोगिश्वरा। नत धरं दस पैडी चढ़ीके, शिव-महल में पग धरा। सभी को पर्व राज पर्यूषण दसलक्षण धर्म पर्व की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ। जय जिनेंद्र। उत्तम क्षमा।



