पूर्ण परमात्मा की जानकारी गीता अध्याय 15 श्लोक 5-6 का है सारांश

जबलपुर दर्पण। गीता के अध्याय 15 के श्लोक 5 में कहा है कि जिनकी आसक्ति प्रत्येक वस्तु से हटकर प्रभु प्राप्ति में लग गई वही साधक उस अविनाशी परमेश्वर के अविनाशी पद को प्राप्त करते हैं तथा श्लोक 6 में कहा है कि स्वयं काल भगवान कह रहा है कि जिस सतलोक में गए साधक लौट कर संसार में नहीं आते उस सतलोक को न सूर्य, न अग्नि और न चन्द्रमा प्रकाशित कर सकते हैं। वह सत्यलोक मेरे लोक से श्रेष्ठ है तथा मेरा परम धाम है। क्योंकि काल (ब्रह्म) भी उसी सतलोक से निष्कासित है। इसलिए कहता है कि मेरा परम धाम (वास्तविक ठिकाना) भी वही सतलोक है।
अध्याय 15 के श्लोक 7 में कहा है कि मेरे इस जीव लोक यानि काल लोक में आदि परमात्मा की अंश जीवात्मा ही प्रकृति में स्थित मन (काल का दूसरा स्वरूप मन है) इन्द्रियों सहित ये छःओं द्वारा आकर्षित जाती हैं।
अध्याय 15 के श्लोक 8 में कहा है कि जैसे गन्ध का मालिक वायु गन्ध को साथ रखती है (ले जाती है)। ऐसे ही पूर्ण परमात्मा अपनी जीवात्मा का स्वामी होने के कारण उसे एक शरीर से दूसरे शरीर में जो उसे (जीवात्मा को) प्राप्त हुआ है, में निराकार शक्ति द्वारा ले जाता है अर्थात् अलग नहीं होता।
अध्याय 15 श्लोक 9 में कहा है कि यह परमात्मा (जो आत्मा के साथ है) कान-आँख व त्वचा, जिह्ना, नाक और मन के माध्यम से ही विषयों (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) का सेवन करता है।
अध्याय 15 के श्लोक 10 में कहा है कि मूर्ख व्यक्ति (इसी परमात्मा सहित आत्मा) को शरीर छोड़ कर जाते हुए तथा शरीर में स्थित तथा गुणों के भोगता (आनन्द लेने वाले) को नहीं जानते। जिनको सृष्टि रूपी वृक्ष का पूर्ण ज्ञान हो गया उन्हें ज्ञान नेत्रों वाले अर्थात् पूर्ण ज्ञानी कहते हैं। वे ही जानते हैं। विशेष प्रमाण के लिए देखें गीता जी के अध्याय 13 के श्लोक 22 से 27 में जिसमें कहा है कि तत्वदर्शी संत सही जानता है कि अविनाशी परमेश्वर जीवों को नष्ट यानि मृत्यु के पश्चात् समभाव स्थित रहता है यानि मृत्यु के पश्चात् अन्य शरीर में जाने से पहले तथा अन्य शरीर में प्रवेश के पश्चात् भी भिन्न नहीं होता यानि उस परमेश्वर की शक्ति अदृश्य रूप में सबको प्रभावित रखती है। अध्याय 15 के श्लोक 11 में कहा है कि भगवत् प्राप्ति का यत्न करने वाले (प्रयत्नशील) योगी (साधक) अपनी आत्मा में स्थित परमात्मा को सही प्रकार से जानते हैं (देखते हैं) और जिनके अन्तःकरण शुद्ध नहीं हैं वे अज्ञानीजन यत्न करने पर भी इस परमात्मा को सही नहीं जानते (देखते)। पूर्ण ज्ञान होने पर प्रतिदिन महसूस होता है कि उस पूर्ण परमात्मा की आज्ञा के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता अर्थात् सर्व प्राणियों का आधार परमेश्वर ही है। जो नादान हैं वे सोचते हैं कि मैं कर रहा हूँ। जब यह प्राणी पूर्ण परमात्मा की शरण में आ जाता है तब पूर्ण ब्रह्म (पूर्ण परमात्मा कविर्देव) उस प्यारे भक्त के सर्व सम्भव तथा असम्भव कार्य करता है। नादान भक्तों को ज्ञान नहीं होता, जो ज्ञानवान हैं उन्हें पता होता है कि यह सर्व कार्य पूर्ण ब्रह्म समर्थ ही कर सकता है, जीव के वश में नहीं है। जैसे एक छोटा-सा बच्चा दीवार के साथ खड़े मूसल (काष्ठ का भारी गोल कड़ी जैसा होता है) को उठाने की चेष्टा करता है। पिता जी मना करता है तो रोने लगता है। फिर उस बच्चे को प्रसन्न करने के लिए उस मूसल को ऊपर से पकड़ कर पिता जी स्वयं उठा लेता है तथा वह अबोध बालक केवल हाथों से पकड़ कर चल देता है। पिता जी कहता है कि देखो मेरे पुत्र ने मूसल उठा लिया। फिर वह बच्चा गर्व से हँसता हुआ चलता है। मान रहा है कि मैंने मूसल उठा लिया। परंतु समझदार व्यक्ति जान जाता है कि मूसल उठाना बच्चे के वश से बाहर की बात है। अध्याय 15 के श्लोक 12,13 में कहा है कि जो सूर्य चन्द्रमा-अग्नि आदि में प्रकाश है। यह मेरा ही समझ और मैं (काल उस परमात्मा के नौकर की तरह) पृथ्वी में प्रवेश करके उसी परमात्मा की शक्ति से सब प्राणियों को धारण करता हूँ। चन्द्रमा होकर औषधियों में रस (गुण) को प्रवेश करता हूँ (पुष्ट करता हूँ)। आदरणीय गरीबदास महाराज (साहेब कबीर जी के शिष्य) कहते हैं कि गरीब, काल (ब्रह्म) तो पीसे पीसना, जौरा है पनिहार।
ये दो असल मजूर (नौकर) हैं, मेरे सतगुरु (अर्थात्कबीर) के दरबार।भावार्थ:- ब्रह्म भगवान तो पूर्ण ब्रह्म का आटा पीसता है और जौरा (मौत) पूर्ण ब्रह्म कबीर साहेब का पानी भरती है अर्थात् ये दोनों मेरे कबीर सतगुरु (पूर्णब्रह्म) के नौकर (मजदूर) हैं। इन्हीं के आदेशानुसार चलते हैं।विशेष: स्वयं काल (ब्रह्म) कह रहा है कि अध्याय 15 के श्लोक 4 में कहा है कि मैं (ब्रह्म-काल) उसी परमात्मा की शरण हूँ, आश्रित हूँ। अध्याय 18 श्लोक 64 में अपना इष्टदेव भी इसी को बताया है।
अध्याय 15 के श्लोक 14 में कहा है कि मैं (ब्रह्म) सब प्राणियों के शरीर में शरण (आश्रितः) लेकर महाब्रह्मा-महाविष्णु-महाशिव रूप से सर्व कमलों में निवास करके नौकर की तरह प्राण व अपान (वायु) के आधार से संयुक्त जठराग्नि हो कर चार प्रकार से अन्न को पचाता हूँ।
अध्याय 15 के श्लोक 15 का अनुवाद है कि मैं सब प्राणियों के हृदय में अंतर्यामी रूप से रहता हूँ और जीव को शास्त्रानुकूल विचार (मत) स्थित करता हूँ। मैं ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (संश्य निवारण कत्र्ता) और वेदान्त कत्र्ता अर्थात् चारों वेदों को मैं ही प्रकाशित करता हूँ। भावार्थ है कि काल ब्रह्म कह रहा है कि वेद ज्ञान का दाता भी मैं ही हूँ और वेदों को जानने वाला मैं ही सब वेदों द्वारा जानने योग्य हूँ।
इस श्लोक में ब्रह्म भगवान ने कहा है कि मैं प्राणियों के हृदय में अपना शास्त्रानुकूल ज्ञान स्थापित करता हूँ तथा उन सर्व शास्त्रों, वेद ज्ञान, स्मृति आदि को मैं (ब्रह्म) जानता हूँ तथा उनमें मेरा ही विशेष ज्ञान है। इसलिए लोक व वेद में मुझको ही श्रेष्ठ भगवान जानने योग्य मानते हैं। विशेष:- सूक्ष्मवेद में कहा है कि प्रत्येक प्राणी के अंतःकरण (हृदय) में काल ब्रह्म तथा पूर्ण ब्रह्म यानि परम अक्षर ब्रह्म प्रतिबिंब की तरह विद्यमान है जैसे एक प्रसारण केन्द्र से एक प्रोग्राम करोड़ों टैलीविजनों में विद्यमान रहता है। जब तक जीव को मानव शरीर में तत्वदर्शी संत से दीक्षा नहीं मिलती, तब तक उस प्राणी पर काल ब्रह्म अपना अधिकार रखता है। पूर्ण संत से दीक्षा के पश्चात् काल ब्रह्म मैदान छोड़ जाता है। पूर्ण परमात्मा सर्व प्राणियों के कर्मानुसार भ्रमण करता है। सत्य भक्ति करने वालों को सत्यलोक यानि सनातन परम धाम में ले जाता है।
गीता अध्याय 13 श्लोक 17 में कहा है कि पूर्ण परमात्मा सर्व प्राणियों के हृदय में विशेष रूप से स्थित है। यही प्रमाण अध्याय 18 श्लोक 61 में है। इससे सिद्ध है कि सर्व प्रभु (ब्रह्मा,विष्णु, शिव व ब्रह्म तथा पूर्ण ब्रह्म) शरीर में भिन्न.2 स्थानों पर दिखाई देते हैं जबकि सर्व प्रभु जीव के शरीर से बाहर हैं, परंतु सर्व समर्थ होने से परम अक्षर ब्रह्म की शक्ति से ही सर्व कार्य होते हैं।



