स्वतंत्रता, स्वाभिमान शौर्य, और प्रबंधन की प्रतिमूर्ति थी वीरांगना रानी दुर्गावती

जबलपुर दर्पण। वीरांगना रानी दुर्गावती की 500 वीं जयंती की पूर्व संध्या पर समरसता सेवा संगठन द्वारा विचार गोष्ठी, सम्मान समारोह एवँ रानी दुर्गावती के जीवन पर आधारित नाट्य मंचन का आयोजन मुख्य अतिथि प्रो. खेमसिंह डेहरिया (कुलपति अटल बिहारी हिंदी विश्वविद्यालय), मुख्य वक्ता प्राचार्य श्रीमती रुकमणी कनोजिया, विशिष्ट अतिथि श्री अर्जुन सिंह मरकाम (सचिव, वनवासी विकास परिषद), श्री रवि गुप्ता (अध्यक्ष, महाकौशल चेम्बर ऑफ कॉमर्स), समरसता सेवा संगठन के अध्यक्ष श्री संदीप जैन की उपस्थिति में शहीद स्मारक प्रेक्षागृह गोलबाजार में आयोजित किया गया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. खेमसिंह डेहरिया ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा आज हम समरसता सेवा संगठन के कार्यक्रम शामिल हुए है और समरसता का सबसे बड़ा उदाहरण रानी दुर्गावती का शासन काल था उन्होंने अपनी दासी के नाम पर भी तालाब का निर्माण कराया ऐसे अनेको उदाहरण हमे उनके शासन में देखने मिलेंगे।
उन्होंने कहा मध्यकालीन भारत का इतिहास लिखने वाले इतिहासकारों ने रानी दुर्गावती एवं गोंडवाना के इतिहास को गौण स्वरुप प्रदान करते हुए छिन्न – भिन्न रुप में प्रस्तुत कर,छल किया है। इसलिए अब शोधपूर्ण वास्तविक इतिहास लिखा जाना अनिवार्य है ताकि रानी दुर्गावती और गोंडवाना साम्राज्य साम्राज्य के इतिहास के साथ न्याय हो और वर्तमान पीढ़ी और भावी पीढ़ी में गर्व और गौरव की अनुभूति हो तथा राष्ट्रवाद की भावना प्रबल हो।
कार्यक्रम की मुख्य वक्ता प्राचार्य श्रीमती रुकमणी कनोजिया ने कहा रानी दुर्गावती स्वतंत्रता, स्वाभिमान शौर्य, और प्रबंधन की प्रतिमूर्ति थी।रानी दुर्गावती ने लगभग 16 वर्ष शासन किया और यही काल गोंडवाना साम्राज्य का स्वर्ण युग था। गोंडवाना साम्राज्य राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक,कला एवं साहित्य के क्षेत्र में सुव्यवस्थित रुप से पल्लवित और पुष्पित होता हुआ अपने चरमोत्कर्ष तक पहुँचा। गढ़ा -मंडला की वीरांगना, रानी दुर्गावती के शासन में जी.एस.टी. जैंसी कर प्रणाली लागू थी। इस प्रणाली से तत्कालीन राज्य की जनता और व्यापारी वर्ग भी अत्यंत प्रसन्न था। जिसके चलते वे कर के रूप में सोने के सिक्के और हाथी तक दिया करते थे। रानी दुर्गावती का गोंडवाना राज्य समृद्ध और संपन्न था।
उन्होंने कहा वीरांगना रानी दुर्गावती के शौर्य, साहस एवं पराक्रम को हम देखे तो पाएंगे कि वीरांगना ने 16 बड़े युद्ध लड़े। 16 युद्धों में से 15 युद्धों विजयी रहीं, जिसमें 12 युद्ध मुस्लिम आक्राताओं से लड़े गये, उसमें से भी 6 मुगलों के विरुद्ध लड़े गये। अंतिम युद्ध में जबलपुर के नरई नाला के समीप जब वह मुगलों से घिर गई तब उन्होंने स्वयं के जीवन का उत्सर्ग कर दिया किन्तु आक्रांताओं के हाथ नही आई।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए विशिष्ट अतिथि श्री अर्जुन सिंह मरकाम ने कहा हमारे कहा हमारे देश का इतिहास रहा है कि अपने देश पर आने वाले हर संकट में हमारी माताओं बहिनों ने अपनी सहभागिता देते हुए उसे दूर करने का प्रयास किया चाहे भगवान राम के काल मे माता सीता हो, महाभारत काल में द्रोपदी हो या रानी लक्ष्मीबाई, रानी दुर्गावती, रानी अवंतीबाई जैसी वीरांगना रही जिन्होंने हाथ मे शस्त्र लेकर मातृभूमि की रक्षा की। ऐसी ही हमारे गोंडवाना साम्राज्य की रानी दुर्गावती की 500वीं है और गोंडवाना काल के 1600 वर्षों के इतिहास में 65 राजाओं ने शासन किया। उन्होंने कहा हमारे वनवासी भाई बहनों को भृमित कर हिन्दू संस्कृति से दूर करने का प्रयास ईसाई मिशनरियों द्वारा किया जा रहा है उसे रोकने के लिए भी समरसता का कार्य महत्वपूर्ण योगदान देगा।



