स्वामी विवेकानंद कॅरियर मार्गदर्शन योजना के तहत व्याख्यान आयोजित

जबलपुर दर्पण । प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस, शासकीय महाकोशल महाविद्यालय, जबलपुर में स्वामी विवेकानंद कॅरियर मार्गदर्शन योजना के अंतर्गत “आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रामचरितमानस” विषय पर एक महत्वपूर्ण व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. सत्यकेतु सांकृत, अध्यक्ष हिंदी विभाग, डॉ. बी.आर. अंबेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली ने विद्यार्थियों और शिक्षकों को संबोधित किया। प्रो. सत्यकेतु सांकृत ने अपने व्याख्यान में कहा कि वर्तमान समय में जब हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की बात करते हैं, तो यह कोई नई अवधारणा नहीं है। दरअसल, हमारी प्राचीन ग्रंथों और साहित्य में इस प्रकार की तकनीकी विचारधाराओं के संकेत पहले से ही मौजूद हैं। उन्होंने उदाहरण के रूप में रामचरितमानस और भगवद गीता का उल्लेख करते हुए बताया कि इन ग्रंथों में ऐसे सिद्धांत मिलते हैं जो आज के एआई के आदर्शों से मेल खाते हैं। प्रो. सांकृत ने कहा, “आधुनिक एआई में रोबोट काम करते हैं, जिनमें क्रिया तो होती है, लेकिन उनमें चेतना और संवेदना की कमी होती है। रामचरितमानस के आदर्शों से एआई को नैतिकता, करुणा, संवेदनशीलता और निर्णय क्षमता की प्रेरणा मिल सकती है।” इस अवसर पर प्रो. अरुण शुक्ल, संभागीय नोडल अधिकारी, जबलपुर संभाग ने अपने संबोधन में कहा, “आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उद्देश्य प्राचीन भारतीय ज्ञान और आध्यात्मिकता को आधुनिक तकनीकी दृष्टिकोण से जोड़ना है, जिससे एक नई दिशा में तकनीकी प्रगति हो सके।” प्राचार्य डॉ. अलकेश चतुर्वेदी ने कहा कि “आज के समय में एआई एक क्रांतिकारी तकनीकी बदलाव लाने वाला क्षेत्र है। एआई का मुख्य उद्देश्य यह है कि मशीनों को इतना बृद्घिमान बनाया जाए कि वे निर्णय ले सकें, समस्याओं का समाधान कर सकें, और मानव समाज के लिए सहायक बन सकें। कार्यक्रम में डॉ. महेन्द्र कुमार कुशवाहा, डॉ. तरुणेन्द्र साकेत, डॉ. सुनीता सिंह, डॉ. नीलिमा, डॉ. शैलेन्द्र भवदिया सहित महाविद्यालय के 67 विद्यार्थी भी उपस्थित थे। कार्यक्रम के दौरान सभी ने भारतीय साहित्य और आधुनिक तकनीकी के बीच गहरे संबंधों पर विचार किया और एआई के भविष्य में भारतीय दर्शन और नैतिकता के योगदान को लेकर चर्चाएं की। यह कार्यक्रम विद्यार्थियों के लिए एक आदर्श दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, जिसमें उन्होंने यह सीखा कि आधुनिक तकनीकी के क्षेत्र में प्राचीन भारतीय ज्ञान की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है



