81 साल बाद जबलपुर में मिली जेरसेस ब्लू बटरफ्लाई

जबलपुर दर्पण। तितलियों का पृथ्वी पर आदिकाल से अस्तित्व रहा है। अंटार्कटिका को छोड़कर हर महाद्वीप पर इनकी उपस्थिति के करण ये सदैव सभी के आकर्षण का केंद्र रही हैं। सर्वप्रथम 1852 में फ्रांसीसी वैज्ञानिक गण-लेपिडोप्टेरा के विशेषज्ञ बोइसडुवल ने जेरसेस ब्लू बटरफ्लाई को खोजा था। परन्तु लम्बी अवधि तक इसकी अनुपस्थिति के बाद 1941 में आई.यू.सी.एन ने इसे विलुप्त प्रजाति घोषित कर दिया। लेपिडोप्तेरा की बटरफ्लाई में शोध को नई दिशा देने हेतु प्रयासरत शासकीय होम साइंस कॉलेज के प्राणीशास्त्र विभाग की श्रद्धा खापरे एवं डॉ. अर्जुन शुक्ला ने इसे जबलपुर शहर में खोज निकाला। कलेक्शन के दौरान ये विलुप्त तितली पहली बार 19 अक्टूबर को बरगी डैम क्षेत्र में अक्षांश 22°94′ उत्तर व 79°92′ देशांतर पूर्व में दूसरी बार 16 दिसंबर को देवताल पहाड़ी अक्षांश 23°15′ उत्तर व 79°89′ देशांतर पूर्व में मिली l पहचान करने के दौरान यह लगा कि यह विलुप्त घोषित बटरफ्लाई ही है क्या ? कुछ जिज्ञासा बढ़ी तथा गहन अध्ययन व टेक्सोनोमिक कीज की सहायता से इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि यह जेरसेस ब्लू बटरफ्लाई ही है।
जबलपुर नर्मदा क्षेत्र में लगभग सभी प्रजातियाँ पाई जाती है l अभी तक कई विलुप्त प्रजातियों की खोज की जा चुकी है, जिसमे राजसौरस डायनासौर के जीवाश्म तक शामिल है l पूर्व में भी नर्मदा क्षेत्र जबलपुर में मोलस्का की नई प्रजातियां मिली हैं, इन सभी उपलब्धियों ने संस्कारधानी जबलपुर के नर्मदा क्षेत्र में शोध कार्य करने की प्रबल संभावनाओं को बल प्रदान किया है।



