आधार बना आम जनता की बड़ी परेशानी: नेटवर्क फेल, भारी भीड़, अवैध वसूली, शिविर लगाकर राहत देने की उठी मांग

जबलपुर दर्पण । जिले और इसके ग्रामीण अंचलों में आधार कार्ड पंजीयन केंद्र अब लोगों की सुविधा के बजाय मुसीबत का केंद्र बनते जा रहे हैं। नेटवर्क विफलता, घंटों लंबी कतारें, बिना प्रशिक्षण संचालित केंद्र और पंजीयन के नाम पर मनमानी वसूली ने आम नागरिकों का जीना दूभर कर दिया है।
राज्य सरकार एक ओर आधार को नागरिक पहचान और सेवा प्रदायगी का प्रमुख माध्यम बनाने में जुटी है, वहीं दूसरी ओर आधार केंद्रों की बदहाल व्यवस्था लोगों को प्रताड़ित कर रही है। मंगलवार को मीडिया प्रतिनिधियों द्वारा जिले के शहरी और ग्रामीण आधार पंजीयन केंद्रों का दौरा किया गया, जहां अराजक व्यवस्था, कर्मचारियों की मनमर्जी और बेतहाशा वसूली के मामले सामने आए।
नेटवर्क फेल, सिस्टम ठप
आधार पंजीयन की प्रक्रिया तकनीकी रूप से मात्र 10 मिनट की होनी चाहिए, लेकिन केंद्रों में यह प्रक्रिया कई घंटों तक खिंच रही है। नेटवर्क समस्या और बार-बार सर्वर डाउन होना एक आम बहाना बन गया है। कुछ केंद्रों में तो ऑपरेटरों के पास मूल प्रशिक्षण तक नहीं है, जिससे प्रक्रिया और भी जटिल हो जाती है।
निर्धारित शुल्क की अनदेखी, 700 तक की वसूली
जहां शासन द्वारा आधार पंजीयन एवं सुधार के लिए न्यूनतम शुल्क निर्धारित है, वहीं जमीनी हकीकत यह है कि 200 से लेकर 700 रुपये तक की अवैध वसूली की जा रही है। जाति, नाम, जन्मतिथि सुधार जैसे मामूली कामों के लिए भी लोगों से मनमाना पैसा लिया जा रहा है।
बुजुर्ग, महिलाएं, बच्चे हो रहे बेहाल
बच्चों के स्कूल दाखिले के दस्तावेज तैयार करवाने से लेकर वरिष्ठ नागरिकों की पेंशन तक—हर सुविधा के लिए आधार कार्ड अनिवार्य हो चुका है। ऐसे में बुजुर्ग, महिलाएं, मजदूर और छात्र घंटों लाइन में खड़े होकर अपमान और अव्यवस्था झेलने को मजबूर हैं।
पीड़ितों की व्यथा
एक महिला ने नाम न छापने की शर्त पर बताया—“मैं एक महीने से बेटी के आधार में जाति सुधार के लिए परेशान हूं, हर बार कोई नया बहाना मिल जाता है।” वहीं कटनी से आई एक अन्य महिला ने बताया कि “बेटी का आधार बन चुका है, लेकिन सुधार कराने के लिए बार-बार भेजा जा रहा है।”
प्रशासन से राहत की मांग
जनता और मीडिया दोनों की ओर से यह मांग उठी है कि जिला प्रशासन तहसील स्तर पर, विशेषकर ग्रामीण और वार्ड क्षेत्रों में, आधार पंजीयन एवं सुधार के लिए वैकल्पिक शिविरों का आयोजन करे। इससे उन नागरिकों को राहत मिलेगी जो लंबी दूरी तय कर के शहर आते हैं और फिर भी निराश लौटते हैं।



