सतना दर्पण

“सतना का खाद्य निगम : भ्रष्टाचार का चावल महोत्सव”

सतना जबलपुर दर्पण । जिले का खाद्य नागरिक आपूर्ति निगम अब निगम कम और निगमित भ्रष्टाचार का ट्रेडिंग सेंटर ज्यादा दिखाई दे रहा है। यहां कामकाज की असली ताकत फाइलों में नहीं, बल्कि राइस मिलरों की थैलियों में बंद होती है।
खाद्य नागरिक आपूर्ति निगम डीएम साहब का कार्यालय अब किसी सरकारी दफ्तर से ज्यादा स्पेशल क्लब बन गया है, जहां राइस मिलर माननीय मेहमान और जनता बेचारे दरबान की भूमिका में हैं। सूत्रों के मुताबिक जिन किसानों का अनाज पसीने से भीगा हुआ होता है, वही अनाज सांठगांठ की धुलाई मशीन में जाता है। और साफ-सुथरा सोना बनकर लौट आता है… मगर किसानों की झोली खाली की खाली रह जाती है।
खाद्य निगम के दफ्तर में पारदर्शिता का हाल यह है कि अगर कोई आम आदमी अंदर झाँके तो उसे सिर्फ धुंध ही धुंध नजर आती है। यह वही धुंध है जो फाइलों पर चढ़ी धूल और राइस मिलरों की जेब से उठी खुशबू से मिलकर बनी है।

कहावत है– “जहाँ धुआँ है, वहीं आग है।” सतना में इसे बदलकर लिखा जा सकता है –
“जहाँ चावल है, वहीं सांठगांठ है।”

खाद्य नागरिक आपूर्ति निगम के डीएम साहब तो मानो ‘राइस-राजा’ हो गए हैं। जिले के मिलरों से उपकृत होकर उन्होंने व्यवस्था को ‘फाइव-स्टार भोज’ बना डाला है। जनता को मिलता है राशन दुकानों पर गीला चावल और वज़न में कटौती, लेकिन अधिकारियों की थाली हमेशा घी-भरी, मलाईदार और खुशबूदार रहती है।

सरकारी रिकॉर्ड में सबकुछ चमचमाता है।

लाखों क्विंटल चावल उठान, वितरण और सफलता की गाथाएँ। लेकिन अगर गांव के किसी उचित मूल्य की दुकान पर जाकर देखिए तो गरीब आदमी के हिस्से का चावल गायब, सिर्फ भ्रष्टाचार का ‘पोलाव’ परोसा जाता है।
अब सवाल यह है कि सतना का यह ‘चावल महोत्सव’ कब तक जारी रहेगा? क्या खाद्य नागरिक आपूर्ति निगम के डीएम साहब कभी राइस मिलरों के दामन से निकलकर जनता की थाली तक देखेंगे, या फिर यह गठजोड़ ऐसे ही चलता रहेगा—
जहाँ चावल की बोरी हो, वहीं ईमानदारी की चोरी हो।

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