जबलपुर दर्पण

विषय पर महाकौशल महाविद्यालय में विचार संगोष्ठी

जबलपुर दर्पण। प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस, महाकौशल शासकीय कला एवं वाणिज्य स्नातकोत्तर महाविद्यालय, जबलपुर में “वन नेशन, वन इलेक्शन“ विषय पर एक विशेष विचार संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ माननीय सांसद आशीष दुबे, माननीय विधायक अशोक रोहाणी, रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. राजेश वर्मा, प्रमुख वक्ता रविंद्र वाजपेई वरिष्ठ पत्रकार तथा महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. अलकेश चतुर्वेदी की गरिमामयी उपस्थिति में हुआ। इस अवसर पर अखिलेश जैन चार्टर्ड एकाउंटेंट तथा वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता रत्नेश सोनकर सहित अनेक प्रबुद्धजन उपस्थित थे। विचार संगोष्ठी में वक्ताओं ने वन नेशन, वन इलेक्शन की आवश्यकता, प्रासंगिकता और व्यवहारिक पक्षों पर गहन विमर्श प्रस्तुत किया। सांसद आशीष दुबे ने अपने वक्तव्य में कहा कि एक साथ चुनाव होने से देश में राजनीतिक स्थिरता आएगी और शासन तंत्र विकास कार्यों पर अधिक ध्यान केंद्रित कर सकेगा। उन्होंने इसे समय, संसाधन और जन-ऊर्जा की बड़ी बचत से जोड़ा।
माननीय विधायक अशोक रोहाणी ने इसे लोकतांत्रिक परंपरा को सशक्त बनाने वाला कदम बताते हुए कहा कि बार-बार आचार संहिता लगने से विकास कार्य ठप हो जाते हैं। एक साथ चुनाव होने से यह समस्या दूर होगी और जनता को भी बार-बार चुनावी प्रक्रिया से गुजरना नहीं पड़ेगा। कुलगुरु प्रो. राजेश वर्मा ने इसे अकादमिक दृष्टिकोण से विश्लेषित करते हुए कहा कि लोकतंत्र के अध्ययन में यह एक प्रयोगात्मक मॉडल है, जिसका सफल क्रियान्वयन भारत को वैश्विक लोकतंत्र की प्रयोगशाला के रूप में स्थापित कर सकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि उच्च शिक्षा संस्थानों में इस विषय पर शोध को प्रोत्साहित किया जाए। मुख्य वक्ता रविंद्र वाजपेई ने आर्थिक पक्ष पर विशेष प्रकाश डालते हुए बताया कि यदि लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाएं, तो भारत को अनुमानतः 50,000 करोड़ रुपये से अधिक की बचत हो सकती है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग, पुलिस, अर्धसैनिक बलों और प्रशासनिक खर्चों में भारी कटौती होगी और संसाधनों का सदुपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार सृजन जैसे क्षेत्रों में किया जा सकेगा। कार्यक्रम में मुख्य संयोजक प्रो. अरुण शुक्ल ने विषय प्रवर्तन करते हुये कहा कि किसी भी व्यवस्था मापदण्डों में समय के अनुकूल परिवर्तन आवष्यक है। परिवर्तन प्रकृति का शाष्वत नियम है। इसी प्रकार चुनाव व्यवस्था में परिमार्जन होना चाहिये। एक राष्ट्र, एक चुनाव हमारे विकसित एवं सवद्ध भारत परिकल्पना को साकार करेगा। प्राचार्य प्रो. अलकेश चतुर्वेदी ने तकनीकी और संस्थागत पहलुओं पर अपनी बात रखते हुए कहा कि इसके लिए विधानसभाओं और लोकसभा के कार्यकाल का सामंजस्य, संवैधानिक संशोधन तथा निर्वाचन आयोग की सुदृढ़ तकनीकी तैयारी अनिवार्य होगी। उन्होंने इसे एक सतत लोकतांत्रिक सुधार की दिशा में ऐतिहासिक पहल बताया और कहा कि भारत का लोकतंत्र अपनी परिपक्वता के उस चरण में है, जहां बड़े और दूरगामी निर्णय संभव हो सकते हैं। कार्यक्रम में वक्ताओं ने यह भी माना कि एक साथ चुनाव से शिक्षा, प्रशासन और सामाजिक जीवन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। विद्यार्थियों को निरंतर शैक्षणिक वातावरण मिलेगा, बार-बार रुकावटें नहीं आएंगी। वहीं सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन चुनावी तनाव और ध्रुवीकरण से मुक्त हो सकेगा। कार्यक्रम का संचालन डॉ. रवीश ताजिर ने किया।

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