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जल-गंगा संवर्धन अभियान की जमीनी हकीकत पर सवाल उठना तो लाजमी है

डिंडोरी, जबलपुर दर्पण ब्यूरो। केंद्र सरकार द्वारा चलाए जा रहे जल-गंगा संवर्धन अभियान कि हकीकत का पता अंचलों से आ रही तस्वीरें को देख कर आसानी से लगाया जा सकता है। सरकार का उद्देश्य देश भर में अभियान चलाकर भू-जल स्तर को बड़ाना रहा है, ताकि आने वाले समय के लिए स्थितियों को और भी ज्यादा बेहतर किया जा सके। एक तरफ जिला प्रशासन जल-गंगा संवर्धन अभियान की सफलता के दावे दूर-दूर तक किए जा रहे हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों से आ रही तस्वीरें देख आंकड़ों की पोल खुलती हुई दिखाई दे रही है। मामला जनपद मुख्यालय समनापुर के स्टॉप डैम में पानी से जुड़ा हुआ है, ग्रामीणों का आरोप है कि उक्त डैम में गेट नहीं होने से पानी का ठहराव नहीं है। स्थानीय ग्रामीणों सहित मवेशियों को भी पीने लायक पानी नहीं मिल रहा, जबकि जल की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकती है, बावजूद गांव में निस्तारित पेयजल संकट बना हुआ है। ग्रामीणों का कहना है कि पानी का उचित उपयोग, वितरण और संरक्षण सुनिश्चित नहीं किया गया, जिससे अभियान केवल फोटो और प्रचार तक सीमित नजर आ रहा है। स्थानीय लोगों के अनुसार गर्मी के दिनों में कई मोहल्ले और बस्तियों में पेयजल की समस्या है, वहीं मवेशियों को भी पर्याप्त पानी नहीं मिल रहा। ऐसे में अब सवाल उठ रहे हैं कि जब पूराने जल संरचनाओं को पुनर्जीवित नहीं किया गया, जल गंगा संवर्धन अभियान केवल फोटो शूट तक ही सिमटा रहा, यही कारण है कि आम लोगों तक इसका लाभ नहीं पहुंच रहा। सूत्रों की माने तो जिलेभर में ऐसे सैकड़ो पुराने तालाब, कुआं, झील व बावली है जो अपने अस्तित्व बचाने कि लड़ाई लड़ रहे हैं, जिन्हें पुनर्जीवित करने की अति जरूरत है। ग्रामीणों का आरोप है कि जिम्मेदार लोग इन वर्षों पूराने जल संरचनाओं को पुनर्जीवित करने की वजह फोटो शूट तक ही अभियान को सीमित रखी जा रही हैं। ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि जल-गंगा अभियान के तहत किए गए विभिन्न कार्यों की वास्तविकता से भौतिक सत्यापन करवाकर मूल्यांकन किया जाए, सुनिश्चित किया जाए कि जल संरक्षण के बाद स्थानीय लोगों को इससे कितना लाभ मिल रहा है। आंकड़ों को सार्वजनिक किया जाए कि जिलेभर में अब तक कितने पुराने तालाब, झील, बावली व कूपों को पुनर्जीवित किया गया हो।

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