संपादकीय/लेख/आलेख

स्वामी विवेकानंद अकल्पनीय शक्ति का भंडार।

लेखक एवं सम्पादकीय सलाह्कार- आशीष राय

सर्वे भवंतु सुखिना, सर्वे संतु निरामया, बहुजन हिताय, बहुजन सुखायश् का नारा देकर विश्व को देकर मात्र 39 वर्ष की आयु में 4 जुलाई 1902 को वेरुल मठ में भारत के इस महान योद्धा सन्यासी ने अपना चोला छोड़ दिया, लेकिन उन्होंने अल्पायु में जो कुछ ऐसा काम किया। आज निर्विवाद रूप से देश के सबसे प्रमुख प्रेरणास्रोत में गिने जाते हैं। आने वाली सदियां बड़ी कृतज्ञता के साथ उन्हें एक वीर सन्यासी के रूप में याद करेगी। विवेकानंद सचमुच क्रांतिकारी विचार थे।

न जाने आज बड़ा अजीब सा लग रहा है। वह शक्ति जो संसार में किसी विशेष कार्य के लिए आई थी, और अपना काम कर कर चली गई। वह दिव्य ज्योति जो अपने मां के अनुसार भगवान शंकर अंश था। अपने गुरु के अनुसार वह नारायण अवतार था। पर हम सबके लिए तो लिए वास्तव में एक अद्भुद शक्ति थी। ऐसी शक्ति जिसका प्रकाश किसी बंद कमरे तक सीमित नहीं रह सका, अपितु वह तो अपना आलोक शहर, प्रदेश, देसी नहीं विदेश और इस दुनिया में फैलाकर गया है। अब से पहले की पुस्तको में जो लिखा, वह तो काल्पनिक था। लेकिन अब जो लिख रहा हूं, वह साक्षात है, भारत एक सनातन देश है,और हम सब सनातनी हैं। इस भारत में दुनिया के दूसरे देशों की अपेक्षा सबसे अधिक विभूतियां हुई हैं। यही वह भारत है, जो दुनिया के दूसरे देशों की अपेक्षा सबसे ज्यादा धनी हुआ है। यही वह भारत है, जो दुनिया के दूसरे देशों से उपेक्षित लोगों के रहने का स्थान बना था। यही वह भारत है, जिसने सभी धर्म संप्रदाय के लोगों को एक साथ रहने का स्थान दिया। इसी भारत में अनंत शक्तियां थी, अनंत विभूतियां थी, अनंत रतन थे, इन सभी को एक साथ, एक शब्द में अगर विवेकानंद कहा जाए, तो गलत नहीं होगा। वह तो ज्ञान व्यक्तित्व का वह समुद्र था, जिसमें अनंता अनंत शक्तियां थी, अगर मैं उनके व्यक्तित्व पर प्रकाश डालूंगा, तो सूर्य को टार्च दिखाने के बराबर है। क्योंकि वह तो अनंत थे। उनके हर शब्द में जीवन जीने की अनोखी कला थी। अगर उनके एक वाक्य को हम सही ढंग से अपने जीवन में उतार लें, तो शायद सारा जीवन का ही उद्धार हो जाए। परम गुरु से प्राप्त आलोकिक शक्ति, जिसने अपने मातृप्रेम, देशप्रेम, धर्मप्रेम, का पाठ पढ़ा कर सारी दुनिया को सिखाया बताया। कि खुद के स्वार्थ के अलावा भी इस संसार में बहुत कुछ है। इस शख्सियत को इस पुस्तक के लिखने से पहले तक ज्यादा नहीं जानता था। ना ही जानने की कोशिश की थी। बस बहुत ही सहज संबंध बन गया था। उनसे बारे कभी किसी से सुनता तो पता चलता है, कि विवेकानंद जी मैं यह खास बात थी, उन्होंने ऐसा किया, उन्होंने वैसा किया, बहुत कुछ। और सब कुछ बस सुना ही था। कभी पढ़ने की कोशिश नहीं, की क्योंकि मैं तो बस उनका एक अंधा भक्त बन चुका था। विवेकानंद जी की पर आज क्या मैं तो कभी भी कुछ कहने की हिम्मत ही नहीं रखता, उस व्यक्तित्व को कहने और बताने के लिए किसी शब्द को उनके अनुपात में ही नहीं समझता। उनका स्मरण ही मेरे लिए शायद बहुत था। जब पूर्व की पुस्तकों में उनकी प्रेरणा लेकर लिखने का विचार किया, तब उन्हें पढ़कर जाने की इच्छा नहीं थी। बस उनकी जितनी बातें जानता था, उन्हीं से इतना प्रभावित था, कि और अधिक जानने की भी इच्छा नहीं हुई। मैं तो उनकी थोड़ी ही बातों में इतना खींचता चला गया, जैसे मानो मेरा कोई उन से विशेष लगाव हो। अब तक जो हुआ, वह सब चल रहा था, और चल भी आ रहा था। पर जब अपनी तीसरी कृति स्वामी विवेकानंद जी के नाम से लिखने का, प्रकाशन करने का विचार किया। तो उनके संपूर्ण व्यक्तित्व को, उनके संपूर्ण जीवन को, जानने के लिए अपने आप को रोक न सका। क्योंकि अगर मैं उनके नाम का उपयोग कर, उनके ज्ञान को ना समझता,और उनके सम्पूर्ण जीवन को न लिखता, तो शायद मैं अपनी लेखनी से बेईमानी करता। इसलिए मैंने दृढ़ संकल्प किया, इससे पहले मैं उनकी पुस्तक पढूंगा, मैं उनको समझूंगा, उनको जानूंगा, उनको पहचानूंगा, उनको मानूंगा और फिर उन पर लिखूंगा। समय कम था और ज्ञान समुद्र बराबर पर विवेकानंद जी का वाक्य याद आ गया, की संभव के आगे जाओगे, तब आप असंभव को हरा पाओगे याद आ गया। और मैं उन्हें जानने के लिए निकल पड़ा। अपने जीवन की पहली पुस्तक वह भी मैंने विवेकानंद जी की उन्हें जानने लिए मैंने रात दिन एक कर दिए। कई रातों को सुबह सबुह तक जागकर उन्हें समझा, उनके जीवन से जुड़े हुए हर पहलुओं, हर घटनाओं, से ऐसा ज्ञान प्राप्त हुआ। की जिसने रातों रात मेरा जीवन ही बदल दिया। उनकी विचारधारा उससे, उनके संघर्ष से, जब मैं परिचित हुआ, तो जीवन के प्रति मेरा सोच, मेरा नजरिया, वह सब परिवर्तित हो गया। मेरी नजरों में उनका सम्मान, अब सातवें आसमान पर था। अब तक में अंधे भक्तों की भांति उनकी पूजा कर रहा था, लेकिन जब उन्हें जाना, पहचाना, समझा तो साक्षात दंडवत हो गया। वास्तव में वह ईश्वरीय रूप था। किसी विशेष उद्देश्य की प्राप्ति इस संसार में लिया।
आज उनकी पुण्यतिथि पर उनके एक पत्र के माध्यम से लिखी उन बातों को अपनी बात अपनी वाणी को विराम देने के लिए उपर्युक्त समझता हूं। वह पत्र जिसमें विवेकानंद जी ने जो लिखा वह शायद एक पुत्र की और मां की बीच की बात है। जिसमें वह मां से मिलने की ललक को दर्शाता है। अब तक की जीवन विलुप्त की कगार पर खड़ा हुआ बताता है। उस वाक्य को प्रारंभ करता हूं जिसमें वह कहते हैं – मुझे खुशी है कि मैंने जन्म लिया था, खुशी है कि मुझे कष्ट हुआ, खुशी है कि मैंने बड़ी गलतियां की, खुशी है की शांति मिली, मैंने किसी को बंधन में नहीं बांधा, मैं भी किसी के बंधन में नहीं हूं, चाहे शरीर धराशाई होगा और मुझे मुक्ति मिलेगी, या मैं शरीर के अंदर की स्वतंत्रता में प्रवेश करूंगा। सारे बुजुर्ग व्यक्ति जा चुके हैं, हमेशा के लिए जा चुके हैं, वह अब कभी वापस नहीं आएंगे, मेरे मार्गदर्शक गुरु, नेता, शिक्षक की मौत हो चुकी है, वह विलुप्त हो रहे हैं, और मैं दूर जा रहा हूं मां, मैं आ रहा हूं, तेरी गर्म छाती में, तू जहां कहीं भी,विचरण कर रही है, मुझे अपने पास बुला ले, निशब्द, विचित्र, आश्चर्यजनक जगत में ले चल, मैं जो कर्ता नहीं बस एक दर्शक रह गया हूँ – तुम्हारे पास आता हूं।
इसके बाद वह भारत वापस आ गए। यहां आने पर उन्होंने बंगाल का भ्रमण किया, लगातार भाग, दौड़ करने के कारण उनकी तबीयत खराब रहने लगी। स्वास्थ्य लाभ के लिए बनारस गए, परंतु कोई लाभ नहीं हुआ। फिर वहां से कोलकाता वापस लौटने पर उनका स्वास्थ्य पुनः खराब हो गया। श्सर्वे भवंतु सुखिना, सर्वे संतु निरामया, बहुजन हिताय, बहुजन सुखायश् का नारा देकर विश्व को देकर मात्र 39 वर्ष की आयु में 4 जुलाई 1902 को वेरुल मठ में भारत के इस महान योद्धा सन्यासी ने अपना चोला छोड़ दिया, लेकिन उन्होंने अल्पायु में जो कुछ ऐसा काम किया। आज निर्विवाद रूप से देश के सबसे प्रमुख प्रेरणास्रोत में गिने जाते हैं। आने वाली सदियां बड़ी कृतज्ञता के साथ उन्हें एक वीर सन्यासी के रूप में याद करेगी। विवेकानंद सचमुच क्रांतिकारी विचार थे। यही कारण है कि उनके विचारों को पढ़ते हुए आज भी हमारे भीतर बिजलियां दौड़ जाती हैं। स्वामी विवेकानंद का जादू पूरी दुनिया ने देखा जिसके गवाह हर जगह मौजूद थे, शायद इसी का परिणाम था कि अकेले स्वामी विवेकानंद ने जितना प्रभावित युवाओ को किया उतना सैकड़ों समाज सुधारको में से कोई नहीं कर पाया। सच तो यह है कि विवेकानंद जैसी प्रतिभा सदियों में कभी कभी जन्म लेती है जो विशेष उद्देश्य की प्राप्ति के लिए संसार पर आती है। स्वामी विवेकानंद ने जीवन के अंतिम दिनों में शुक्ल यजुर्वेद की व्याख्या में कहा एक और विवेकानंद चाहिए, यह समझने के लिए कि इस विवेकानंद ने अब तक क्या किया है ?

आशीष राय
लेखक – “स्वामी विवेकांनद मेरे आदर्श मेरी यात्रा”
एवं संपादकीय सलाहकार
जबलपुर दर्पण

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