सरकारी जमीनों को लील गये जिले के नामी भूमाफिया


प्रशासनिक लापरवाही के कारण निपट रही है संपत्ति
सतना। बड़े हैरत की बात है कि मध्यप्रदेश शासन की बेशकीमती जमीनों को लेकर जिले का लोकल प्रशासन जरा सा गंभीर नहीं है। प्रशासनिक लापरवाही का खुलासा हाल ही मध्य प्रदेश विधानसभा के अंदर हुआ है। सतना शहर की सरकारी जमीनों में अवैध निर्माण एवं खरीद फरोख्त को गंभीरता से लेते हुए सतना कलेक्टर अजय कटेसरिया ने जिले के राजस्व अमले को एक सप्ताह के अंदर स्मार्ट सिटी की सभी सरकारी जमीन अतिक्रमण मुक्त कराने के निर्देश दिए थे। लेकिन बड़े अफसोस की बात है कि पांच दिन का समय बीत जाने के बाद भी राजस्व विभाग ने किसी तरह की कार्यवाही को अंजाम नहीं दिया गया है। सबसे मजेदार और चौंकाने वाली बात यह है कि राजस्व विभाग के पास नगर निगम सतना की सीमा के अंदर मध्य प्रदेश शासन की कितनी आराजियो में अवैध है, इसकी परस्पर कोई सत्यापित जानकारी नहीं है। मध्य प्रदेश शासन और नजूल की जमीनों को लेकर जमकर लीपापोती को राजस्व विभाग ने अंजाम दिया है। सूत्रों ने बताया कि राजस्व विभाग की घोर लापरवाही के कारण ही पूरे सतना जिले में मजबूत भू माफियाओं ने सरकारी जमीनों को हडप लिया है। सतना कलेक्टर अजय कटेसरिया को सख्त कार्रवाई का तौर-तरीका अपनाना होगा, तभी सरकारी जमीनों को अतिक्रमण मुक्त कराने में उम्मीद के मुताबिक सफलता मिलेगी। प्रशासनिक गलियारे से निकल रही सूचनाओं के अनुसार रघुराजनगर तहसील के साथ साथ मैहर, अमरपाटन, रामपुर बघेलान, कोठी, कोटर, बिरसिंहपुर, सोहावल, नागौद सहित सतना जिले के अन्य हिस्सों में मौजूद सरकारी जमीनों पर भू माफिया जैसी दीमक प्रभावी हो गई है।
80 पेज की रिपोर्ट में 200 अतिक्रमण कारी
मध्य प्रदेश शासन की बहुतायत जमीनों पर भू माफियाओं का कब्जा है। विधानसभा को सतना के राजस्व अमले ने 80 पेज की जानकारी भेजी है, जिसमें सरकारी आराजियो पर 200 अतिक्रमण करने वालोें को काबिज बताया गया है। दो साल का वक्त गुजर जाने के बाद भी राजस्व विभाग की टीम एक भी सरकारी जमीन को अतिक्रमण मुक्त नहीं करा पाया है। सूत्रों ने बताया कि हमेशा ही सरकारी जमीनों को लेकर राजस्व विभाग की लापरवाही सुखियों में बनी रहती है। बहुत से ऐसे भी सतना जिले में मामले हैं, जहां पर शासन की जमीनों को निपटाने में स्वयं राजस्व विभाग की भूमिका संदिग्ध सुखियों में रहती हैं। यदि सतना कलेक्टर अजय कटेसरिया अपने भरोसेमंद अधिकारियों के जरिए सरकारी जमीनों की तहसीलवार जांच करवाएं तो अब तक का सबसे बड़ा सरकारी जमीन घोटाला सबके सामने होगा। सतना कलेक्टर अजय कटेसरिया के लिए बेलगाम राजस्व विभाग के दम पर जिले भर में सरकारी जमीनों को सुरक्षित करना आसान नहीं होगा।
शहर में कितनी जमीन, किसी को पता नहीं
शहरी क्षेत्र में मध्य प्रदेश शासन की कितनी जमीन है, इस संबंध में राजस्व विभाग के अधिकारियों को कोई जानकारी नहीं है। नजूल एवं जिला प्रशासन के पास ऐसे कोई अभिलेख नहीं है, जिससे यह पता लगाया जा सके कि शहरी सीमा के अंदर शासन की कितनी जमीन है। इस लापरवाही का खुलासा विधानसभा में लगाए गए प्रश्न में जिला प्रशासन द्वारा दिए गए जवाब से हुआ है। विधानसभा ने जिला प्रशासन सतना से यह जानकारी मांगी थी कि सतना शहर की नगरीय सीमा के अंदर कितनी सरकारी जमीन है? उसमें से कितनी जमीन में अतिक्रमण है और कितनी सुरक्षित है? इस सवाल का गोलमोल जवाब देते हुए राजस्व विभाग ने विधानसभा को 80 पेज की अतिक्रमण करने वालों की लिस्ट तो दे दी, लेकिन वह यह नहीं बता पाया कि शहर में कितनी जमीन सरकारी है? कुल मिलाकर सतना जिले में भू माफियाओं के तगड़े नेटवर्क को तोड़कर सरकारी जमीन सुरक्षित करना जिला प्रशासन के बूते की बात नहीं है?
जमीनों को अतिक्रमण मुक्त कराना सबसे बड़ी चुनौती
राजस्व विभाग के सूत्रों ने बताया कि बीते दिनों राजस्व विभाग के अधिकारियों की बैठक में कलेक्टर अजय कटेसरिया ने वर्ष 1958-59 की खतौनी में दर्ज सभी सरकारी जमीनों को अतिक्रमण मुक्त कराने के निर्देश राजस्व विभाग को दिए थे। लेकिन जिला प्रशासन के लिए सतना जिले के रसूखदारों के कब्जे से सरकारी जमीन छुड़ाना आसान नहीं है। क्योंकि लाखों की सरकारी जमीन डकार कर बैठे रसूखदारों का कनेक्शन किसी न किसी राजनैतिक दल से जुड़ा होता है। उनके रसूख के आगे जेसीबी का पंजा चलाना प्रशासन के बूते की बात नहीं है। सतना जिले में अतिक्रमण से घिरी सरकारी जमीनों को मुक्त कराना जिला प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। सूत्रों ने बताया कि वर्ष 1958-59 की खतौनी में दर्ज बहुतायत सरकारी जमीनों पर रसूखदारों ने अतिक्रमण कर रखा है, राजस्व विभाग तो इन प्रभावशाली रसूखदारों की तरफ देखना तक मुनासिब नहीं समझता है। रसूखदारों के बढ़ते दबाव की वजह से राजस्व विभाग लगातार अपने दायित्वों के प्रति फिसड्डी साबित हो रहा है।
राजनैतिक पावर का अक्सर करते हैं नाजायज इस्तेमाल
किसी जमाने में राजनीति को समाजसेवा का सबसे बड़ा माध्यम माना जाता था, उस दौर के नेताओं की प्राथमिकता में हमेशा जनता रहती थी। प्रमुखता के साथ जन समस्याओं को उठाने और जनमानस को राहत दिलाने का काम जिम्मेदारी के साथ किया जाता था। आज आधुनिक जमाने के नेताओं का बोलबाला है, सांसद अथवा विधायक का इलेक्शन एक दो बार जीतने वाले ज्यादातर नेता अपने आपको खुदा समझने लगते हैं। आम जनता तक उनकी प्राथमिकता में जगह नहीं बना पाती है। इस समय हमारे विंध्य प्रदेश में भी आधुनिक जमाने के नेताओं का दबदबा कायम है। विकास और जनहित केवल भाषणों और आश्वासन की चार दीवारी में कैद होकर रह जाते हैं। चाहे भारतीय जनता पार्टी हो या फिर देश की सबसे पुरानी कांग्रेस पार्टी , हर जगह दिखावा करने वाले नेताओं की बहुलता है। जनता के सहारे जिन नेताओं को विधायक, सांसद अथवा महापौर का पद नसीब होता है, वे कुर्सी पर बैठते ही जनता के जरिए मिले राजनैतिक पावर का नाजायज इस्तेमाल अपने स्वयं और अपने करीबियों के लिए करना ही पसंद करते हैं। यही वजह है कि जल्द ही मौका परस्त नेताओं को जनमानस दुध में पड़ी मख्खी की तरह निकाल कर बाहर फेंक देता है। प्रशासनिक जानकारों ने बताया कि सतना शहर सहित जिले की सभी तहसीलों में प्रभावी रूप से उन रसूखदारों ने सरकारी जमीन को दबा रखा है, जिनके कंधों पर जनता ने समुचित विकास करने के लिए महत्वपूर्ण दायित्व सौंप रखा है।



