मण्डला दर्पणमध्य प्रदेश

किशोरो को बताए लड़के, लड़कियों में कोई फर्क नहीं, वितरित किये इंसेटिव किट

समाज माहवारी को शर्म का विषय मानकर चुप्पी साध लेता है ।
समय बदल गया लड़कियां किसी से कम नहीं

मंडला। जिले के नौ विकासखंडों में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम संचालित किया जा रहा है। कार्यक्रम के क्रियान्वयन के लिए प्रशिक्षित मास्टर ट्रेनर व परामर्शदाता द्वारा सपोटिव सुपर विजन और विभिन्न गतिविधियां की जा रही है। जिससे ग्राम के किशोर अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हो सके। कार्यक्रम के अंतर्गत मंडला विकासखंड के आमानाला आंगनवाडी केन्द्र में साथिया को प्रोत्साहित करने इंसेटिव किट वितरण किया गया। इस दौरान इन्हें लैंगिग भेद भाव के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए उनमें होने वाले भेदभाव को बताया। इस दौरान काउंसलर नेहा पटेल, मास्टर ट्रेनर शानू नामदेव, सोनम साहू, रवि शंकर झारिया, नीलू लोधी, साथिया और आशा कार्यकर्ता मौजूद रही।
बताया गया कि कार्यक्रम का उद्देश्य गांव के किशोर, किशोरियों को अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना है। जिससे आने वाले समय में किशोरों को युवास्था में शरीरिक, मानसिक परेशानी का सामना ना करना पड़े। जिले में कार्यक्रम का संचालन कार्ड संस्था द्वारा किया जा रहा है। कार्यक्रम में प्रशिक्षित परामर्शदाता और प्रशिक्षकों द्वारा ग्रामों में जाकर किशोर, किशोरियों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने के साथ स्वास्थ्य संबंधी जानकारी प्रदान कर रहे है।
साथिया का बढ़ाया मनोबल- ग्राम आमानाला के आंगनवाडी केंद्र में इंसेटिव किट वितरण कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में 14 ग्राम के किशोर, किशोरी साथिया मौजूद रहे। कार्यक्रम में उपस्थित अतिथियों ने किशोर किशोरी को साफ सफाई, एनीमिया, किशोर किशोरी के बदलाव, नशे के दुष्परिणाम के बारे में विस्तार से बताया। कार्यक्रम के दौरान मौजूद किशोर किशोरी साथिया का मनोबल बढ़ाया और इंसेटिव किट में साथिया को कैप, एप्रेन, लोबर, टीशर्ट और छाता दिया गया। उपस्थित साथिया को जीवन में आगे बढऩे के लिए प्रेरित किया। किशोर, किशोरियों को गुड टच, बेड टच, एनीमिया, पोषड आहार, तिरंगा भोजन को विस्तार से समझाया।

लड़के, लड़कियों में होता है भेदभाव- उपस्थित साथिया को बताया गया कि पुरुषों की तुलना में शिक्षित महिलाओं की संख्या कम हैं। वर्तमान समय में बड़ी संख्या में युवतियां स्कूल जा रही हैं, लेकिन बहुत सी लड़कियाँ गरीबी, शिक्षण सुविधाओं के अभाव व अन्य कारणों से शिक्षा पूरी किए बिना ही विद्यालय छोड़ देती हैं। विशेषकर वंचित वर्ग, आदिवासी और अन्य वर्ग की लड़कियां बड़ी संख्या में स्कूल को बीच में ही छोड़ देती हैं। समाज में प्राय: सोचा जाता हैं कि घर के बाहर महिलाएं कुछ खास तरह के काम ही कर सकती हैं। लड़कियों और महिलाओं को तकनीक कार्य की समझ नही होती है, इस प्रकार की रूढि़वादी धारणाओं के चलते लड़कियों को अनेक कार्यों व व्यवसायों की शिक्षा और प्रशिक्षण लेने के लिए परिवार का सहयोग नही मिल पाता हैं। लड़के और लड़कियों में होने वाले भेदभाव के कारण लड़कियां पीछे रह जाती है, लेकिन आज समय बदल गया है, अब लड़कियां किसी से भी कम नहीं है।
खुलकर नहीं होती चर्चा-
उपस्थित साथिया को माहवारी के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई। उन्हें बताया कि माहवारी भी महिला व किशोरियों में आने वाली जरूरी शारीरिक प्रक्रिया है। जिसके बारे में समाज में अनेक प्रकार की भ्रांतियां और कुप्रथाएं फैली हुई हैं। यह कुप्रथा या भ्रांति अशिक्षित समाज के साथ-साथ ही पढ़े लिखे समाज में भी गहराई तक अपनी जड़े जमाई हुई है। आज भी समाज शर्म का विषय मानकर इस मुद्दे पर एक चुप्पी बनाया हुआ है। जिसके विषय में खुलकर चर्चा नहीं होती है। यदि आप इस विषय पर बात करना भी चाहते हैं तो उसे गन्दी बात समझी जाती है। इस विषय की अज्ञानता घर से शुरू होकर समाज तक और समाज से आरम्भ होकर भगवान के द्वार तक एक नियम की तरह पहुंच जाती है।

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