” पिता की परछाइयां “

पिता परिवार की मजबूत एवं आघातवर्धनीय वो आधार स्तंभ है ।
जिस पर टिके हुए घर के सभी छोटे बड़े पिलर या खंभ हैं।
परिवार को संभालने एवं संवारे रखने की अटूट बागडोर हैं ।
जो घर के किसी भी सदस्य को न जाने देती बुरे ओर हैं ।
सुरक्षा और संरक्षा में अभिन्न मधुमक्खियों सा छत्ता हैं ।
जो किसी तरफ से न आने दे एक छोटा सा बत्ता हैं ।
ऊपरी दिखावा बहुत ही तेज तर्रार सख्त और बड़ा ही गर्म हैं ।
वास्तविकता में अंदर की गहराइयों में देखें तो नर्म ही नर्म हैं ।
पिता आंधी तूफान से लङने हौसलो की वो फौलादी दीवार हैं ।
जो हर बड़ी परेशानियों को किनारे करने की दो धारी तलवार हैं ।
अपनी सन्तान को हर बेहतर सुख सुविधा दे पाना परम लक्ष्य हैं ।
सभी को दिया गया प्रेम स्नेह और प्यार बिल्कुल ही निष्पक्ष हैं ।
उनके अंदर दुनियां के सारे दुखो दर्द सितम सब दफन हैं ।
अपनी सन्तान की किसी से कम नहीं होने देते कोई टसन हैं ।
हृदय की विशालता कर्तब्य परायणता आकाश में भी व्याप्त हैं ।
जिसकी किसी से तुलना कर पाना बिल्कुल ही अपर्याप्त हैं ।
देखने को तो आकाश में एक से एक सुन्दर टिमटिमाते तारे हैं ।
बाकी आप नेकियों और अच्छाइयों में इनसे भी प्यारे हैं ।
पिता ही तो कल्पतरू पिता ही अमूल्य शीतल परिजात हैं ।
जिनमें शामिल दुनियां के सारे सुख आनंद ,
आत्मसात हैं आपके द्वारा किया गया त्याग बलिदान क्षमता सब अनुकरणीय हैं ।
भगवान सलामत रखें पिता रुपी वट-वृक्ष को जो देवताओं में भी पूज्यनीय हैं।



