अध्यात्म/धर्म दर्पणजबलपुर दर्पणमध्य प्रदेश

जैन संस्कृति और परंपरा में सोला के भोजन का महत्व

संकलन/प्रेषक- आशीष जैन जबलपुर दर्पण

हमारे देश के श्रेष्ठतम धर्मों में से एक जैन धर्म संस्कृति और परंपरा में परमपूज्य मुनिराजों एवं त्यागी व्रतियों के चौका आहार व्यवस्था में अक्सर सोला शब्द प्रयोग किया जाता है। कई बार जानकारी के अभाव में सोला शब्द एक रूढ़िवादी परम्परा सा लगने लगता है। लेकिन सोला को सोला क्यों कहा जाता है? आइये हम इस पर जैन आगम की सामान्य जानकारी को विस्तार से जानने का प्रयास करते है। दर-असल यह सोला शब्द भोजन निर्माण संबंधी सोलह नियमों पर आधारित एक स्वास्थ्य प्रधान खोज परक भोजन निर्माण शैली है, जिसे कालान्तर में सोला शब्द तक सीमित होना पड़ा। असल में यह सोलह नियमों एवं विधियों का पूरा संग्रह विस्तृत संग्रह है। भोजन निर्माण संबंधी सोलह नियम या भोजन निर्माण प्रक्रिया के सोलह नियमों को प्रमुख चार वर्गों में विभाजित हैं। द्रव्य शुद्धि, क्षेत्र शुद्धि, काल शुद्धि, और भाव शुद्धि। द्रव्य शुद्धि में अन्न शुद्धि अथार्त खाद्य सामग्री सड़ी गली घुनी एवं अभक्ष्य नही होना चाहिए। जल शुद्धि अथार्त जल जीवानी किया हुआ और प्रासुक हो। अग्नि शुद्धि अथात ईंधन देखकर शोध कर उपयोग किया गया हो। कर्त्ता शुद्धि मतलब भोजन बनाने वाला स्वस्थ हो, स्नान करके धुले शुद्ध वस्त्र पहने हो, नाखून बडे न हो, अंगुली वगैरह कट जाने पर खून का स्पर्श खाद्य वस्तु से न हो, गर्मी में पसीने का स्पर्श न हो या पसीना खाद्य वस्तु में ना गिरे।
दूसरा क्षेत्र शुद्धि में प्रकाश शुद्धि मतलव रसोई में समुचित सूर्य का प्रकाश रहता हो। वायु शुद्धि, रसोई में शुद्ध हवा का संचार हो। स्थान शुद्धि में रसोई लोगों के आवागमन का सार्वजनिक स्थान न हो एवं अधिक अंधेरे वाला स्थान न हो। तथा दुर्गंध शुद्धि अथार्त हिंसादि कार्य न होता हो, गंदगी से दूर हो। तीसरा काल शुद्धि में ग्रहण काल चंद्र ग्रहण या सूर्य ग्रहण के काल में शोक काल दुःख अथवा मरण के समय, रात्रि काल के समय तथा धर्म प्रभावना अर्थात् उत्सव काल के समय भोजन नहीं बनाना चाहिए। अंतिम भाव शुद्धि में पात्र और धर्म के प्रति वात्सल्य, सब जीवों एवं पात्र के ऊपर दया करूणा, विनय तथा दान भाव होना चाहिए ।
जो भी जैन संस्कृति और परंपरा में सोला का भोजन मुनि महाराज आर्यका माताजी एवं त्यागी व्रतियों के लिए बनता है,उनमें इन सोलह नियमों का पूर्ण रुप से पालन किया जाता है और सभी जैन बंधुओं को इसका पालन और पूर्ण जानकारी होना आवश्यक है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button

You cannot copy content of this page

situs nagatop

nagatop slot

kingbet188

slot gacor

SUKAWIN88