साहित्य दर्पण

दिल की बात

लिखने बैठी आज कलम ,
लिखती दिल की बात ।
शब्द जब मिलते नहीं ,
लिखती क्या फिर आज ।

भीतर है एक शोर हुआ ,
कैसे कहूंँ मैं आज ।
सोचूँ बैठी मैं यही ,
किससे कहूंँ ये राज।

छल भरा है मन में सबके ,
निश्चल मन ये सोंच।
देना किसका साथ है,
राह वही तो खोज ।

मन उड़ता पंछी सदा ,
उड़ता है हर रोज ।
छूए वो ऊंचाई तब ,
दे जब संघर्षों पे जोर।

होवे हर मन निश्चल तब ,
जो स्वार्थ वो देवे त्याग ।
देता तब ही वो मन प्यारे,
सब की खुशियों में साथ।

न कर तू यूँ कैद किसी को,
कर दे तू आजाद ।
स्नेह डोर ही रक्खे उसको ,
जो होगा तेरा खास।

तेरी सोच ही बनती प्यारे ,
तेरा वो विश्वास ।
कहे स्नेहिल सुन ले साथी,
आज दिल की बात।।

पूनम शर्मा स्नेहिल

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