शहर हो गया अपना गांव

गाँवों की शुद्ध हवाओं में
कुछ शहरीय गन्ध का मेल हुआ
कुछ रौब झाड़ने के चक्कर में
फैशन का यह ट्रेंड हुआ।
याद है
हम न्यौता में मीलों तक जाते थे
दो दिन पहले से ही
मित्रों की टोली बनाते थे
हंसी-ठिठोली करते
रास्ते में पल कट जाते थे
अफ़सोस अब कुछ नया हुआ है
अपना गाँव भी शहर में घुला हुआ है ।
बैट-बाल को थाम
हम मैदानों में जाते थे
चौकों-छ्क्कों की बारिश से
गायब गेंद कराते थे
फिर सब मिलकर दूढ़ा करते थे
अफ़सोस अब सब दुर्लभ हुआ
पबजी के युग में सब बन्द हुआ
स्कूलों से घर तक
पगडंडी से आना होता था
दौड़-भाग और आइस- पाईस का
खेल रास्ते में होता था
कभी बेर और कभी आम
गन्नों पर भी धावा होता था
अफ़सोस ऐसी मौजों का भी अन्त हुआ
इस युग में
बच्चों का बचपन कमरों में बन्द हुआ
रिश्ता एक से
पर रिश्तेदारी पूरे गाँव से होती थी
चीन्टू की मौसी
सबकी मौसी होती थी
फूफाजी की चिठ्ठी में
सबकी हाल खबर होती थी
मामा, बेटे के शादी में
पूरे गाँव का न्यौता दे आते थे
ऐसे प्यारे रिश्तों का
न जाने कैसा अन्त हुआ
वॉट्सएप्प आने पर
सब काम बन्द हुआ।
सुबह-सवेरे उठकर
हम बड़ों का पैर छुआ करते थे
अब न कोई फादर न मदर-डे रहा
संस्कार और ताल-मेल
हर घर का गहना होता था
जब बड़े बुजुर्गों के पास बैठ
बच्चा किस्सा सुनाता था
हाय-हेल्लो के चक्कर में
अपने प्रणाम का नाश हुआ
अब इस मॉडर्न गाँव को देखो
छोटे शहर का विकास हुआ
!! समाप्त!!
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प्रति :-
अंकित शुक्ल c/o प्रभुनाथ शुक्ल (स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तम्भकार)
ग्राम: हरीपुर, पत्रालय : अभिया
जिला : भदोही
पिन : 221404 (उप्र)
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