हर इच्छा मन्नत पूर्ण करने वाली माता श्री हरसिद्धि जी


शारदीय नवरात्र विशेष
आलेख- आशीष जैन जबलपुर दर्पण
जबलपुर दर्पण। प्राचीन काल से ऐसी मान्यता है कि हरसिद्धि माता से जो भी मन्नत मांगी जाती है वह पूर्ण अवश्य होती है, इसी कारण माता को हरसिद्धि माता पुकारा जाता है। रानगिर बाली हरसिद्धि माँ सिद्धिदात्री माता दिन में तीन रूप धारण करने के लिये प्रसिद्ध हैं। सागर जिले की रहली तहसील में पहाड़ों और जंगलों के बीच बसे छोटे से ग्राम रानगिर में प्रसिद्ध हरसिद्धि माता का मंदिर है। यह क्षेत्र शक्ति साधना के लिए जाना माना जाता है। यहां चैत्र एवं शारदेय नवरात्र पर भव्य मेला लगता है। पहले आवागमन के साधनों के अभाव एवं पहुंच मार्गों की दशा ठीक नहीं होने के कारण कुछ समय के लिये ही मेला लगता था, परन्तु कुछ वर्षों से इस क्षेत्र में हुए विकास कार्यों के कारण माता के दरबार तक आना-जाना सुगम हो गया है। यहां लगभग साल भर ही मेले जैसा माहौल रहता है। आसपास के क्षेत्रों से माता रानी को मानने वाले भक्त दर्शन के लिए यहां जरूर आते हैं और नवजात बच्चों के मुन्डन आदि संस्कार संपन्न कराते हैं।
नवरात्रि के दिनों में माता के दर्शन एवं आराधना करने का विशेष महत्व होता है। प्राचीन काल से ऐसी प्रवल मान्यता है कि माता हरसिद्धि जी से जो भी मन्नत मांगी जाती है वह पूर्ण अवश्य होती है। दूर-दूर से भक्त गण अपनी मन्नत पूर्ण कराने के लिए माता रानी को श्रंगार व श्रीफल अर्पित करते हैं। इसी कारण माता को श्री हरसिद्धि माता पुकारा जाता है।
माता की अनगढ़ प्रतिमा🙏🏽
रानगिर में विराजमान मां हरसिद्धि की प्रतिमा देखने में अनगढ़ प्रतीत होती है यानि इसे किसी शिल्पी ने नहीं गढ़ा अन्यथा यह अधिक सुंदर और सुडौल होती और न ही किसी पुरोहित ने इस प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा की अन्यथा यह भूमितल से ऊंचे मंदिर में ऊंची वेदिका पर विराजमान होती जबकि- यह प्रतिमा भूमितल से नीचे विराजमान है। वस्तुतः कन्या रूप धारिणी यह प्रतिमा ऐंसे दृष्टिगोचर होती है कि कोई कन्या यहां खड़ी-खड़ी पाषण में रूपांतरित हो गई हो।
माता के दिन में तीन रूप के दर्शन🙏🏽
सिद्धिदात्री माता रानी दिन में तीन रूप धारण करने के लिये प्रसिद्ध हैं। मान्यता है कि प्रातः काल में माता बाल कन्या के रूप में दर्शन देती हैं। दोपहर बाद माता नवयुवती-नवशक्ति का रूप धारण कर लेती हैं। शाम ढलने के बाद वह वृद्ध माता के रूप में भक्तों को आशीर्वाद देती हैं।
नवीं देवी हैं हरसिद्धि माता🙏🏽
दुर्गा सप्तशती में दुर्गा कवच के आधार पर स्वयं ब्रह्मा जी ऋषियों को नवदुर्गा के नामों का उल्लेख करते हुए कहते है कि
“प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी ।
तृतीयं चंद्रघण्टेति, कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ।
पंचमं स्कंदमातेति,षष्ठं कात्यायनीति च ,
सप्तमं कालरात्रीति,महागौरीति चाष्टमम् ।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा प्रकीर्तिताः।।
अर्थात् नवीं देवी सिद्धिदात्री भक्तों की मनोकामनाएं सिद्ध करने बाली देवी ही रानगिर में हरसिद्धि के रूप में विराजमान हैं।
मंदिर का इतिहास🙏🏽
मंदिर का निर्माण कब और कैसे हुआ इसका कोई पुख्ता प्रमाण नहीं है, परन्तु यह मंदिर अतिप्राचीन और ऐतिहासिक है। इतिहासकारों के मुताबिक कुछ लोग इसे महाराज छत्रसाल द्वारा बनवाए जाने की संभावना व्यक्त करते हैं क्योंकि सन् 1726 में सागर जिले में महाराज छत्रसाल द्वारा कई बार आक्रमणों का उल्लेख इतिहास में वर्णित है। सिंधिया राज घराने का संबंध भी रानगिर से होना बताया जाता है।
वन कन्या देती थी चांदी का सिक्का🙏🏽
हरसिद्धि माता के बारे में कई किवदन्तियां प्रचलित है कि रानगिर में एक अहीर चरवाहा हुआ करता था। चरवाहे की एक छोटी बेटी थी। बेटी के साथ एक वन कन्या रोज आकर खेलती थी एवं अपने साथ भोजन कराती थी तथा रोज एक चांदी का सिक्का देती थी। चरवाहे को जब इस बात की जानकारी लगी तो एक दिन छुपकर दोनों कन्या को खेलते देख लिया चरवाहे की नजर जैसे ही वन कन्या पर पड़ी तो उसी समय वन कन्या ने पाषाण रूप धारण कर लिया। बाद में चरवाहे ने कन्या का चबूतरा बना कर उस पर छाया आदि की और यहीं से मां हरसिद्धि की स्थापना हुई।
रानगिर का रहस्य🙏🏽
एक और किवदन्ती के अनुसार भगवान शंकर जी ने एक बार सति के शव को हाथों में लेकर क्रोध में तांडव नृत्य किया था। नृत्य के दौरान सती माता के अंग पृथ्वी पर गिरे थे। सती माता के अंग जिन जिन स्थानों पर गिरे वह सभी शक्ति पीठों के रूप में प्रसिद्ध हैं। ऐसी मान्यता है कि रानगिर में सती माता की राने (जांघें) गिरी थीं और इसीलिए इस क्षेत्र का नाम रानगिर पड़ा। रानगिर के पास ही गौरीदांत नामक क्षेत्र है यहां सती माता के दांत गिरना माना जाता है।
भगवान राम से संबंध🙏🏽
एक अन्य किंवदन्ती के अनुसार भगवान राम ने वनवास के दौरान रानगिर के पर्वतों पर विश्राम किया था और इस कारण इस क्षेत्र का नाम रामगिरी था जो बाद में रानगिर हो गया।
मनोहर दृश्य
रहली-सागर मार्ग से रास्ता माता हरसिद्धि मंदिर की ओर जाता है क्षेत्र की भव्यता का और मनोहर दृश्यों से मन खुश हो जाता है। कच्चे-पक्के मकानों जंगल पहाड़ और नदी नालों से गुजरता हुआ रास्ता रानगिर माता मंदिर पहुंचता है। मंदिर के आसपास पूजन सामग्री की दुकान है जो मंदिर और माता की भव्यता का श्रृंगार करती हैं।
रानगिर मंदिर पहुंच मार्ग🙏🏽
देहार नदी के पूर्व तट पर घने जंगलों एवं सुरम्य वादियों के बीच स्थित हरसिद्धि माता के दरबार में पहुंचने के लिए जिला मुख्यालय सागर से दो तरफा मार्ग है। सागर, नरसिंहपुर नेशनल हाइवे पर सुरखी के आगे मार्ग से बायीं दिशा में आठ किलोमीटर अंदर तथा दूसरा मार्ग सागर-रहली मार्ग पर पांच मील नामक स्थान से दस किलोमीटर दाहिनी दिशा में रानगिर स्थित है। मेले के दिनों में सागर, रहली, गौरझामर, देवरी से कई स्पेशल बस दिन-रात चलती हैं। दोनों ओर से आने-जाने के लिए पक्की सड़कें हैं। निजी वाहनों से भी लोग पहुंचते हैं। आप भी पहुंचे और माता रानी के दर्शन प्राप्त करें, जय मां हरसिद्धि।



