जबलपुर दर्पणमध्य प्रदेश

चरित्रवान, मर्यादित, परोपकार परिपूर्ण जीवन जीने वाले ही प्रभु कृपा के अधिकारी : हरि चैतन्य महाप्रभु

जबलपुर दर्पण। प्रेमावतार, युगदृष्टा, श्री हरिकृपा पीठाधीश्वर एवं भारत के महान सुप्रसिद्ध युवा संत 1008 स्वामी हरि चैतन्य पुरी महाराज ने आज यहाँ सनातन धर्म पब्लिक स्कूल में विशाल समुदाय को संबोधित करते हुए कहा कि सत्संग पाकर अपने जीवन में वांछित सुधार भी अवश्य करें। अन्यथा विशेष लाभ से वंचित रह जाएंगे,संत गुरु व परमात्मा का कृपापात्र वही बन सकता है जो चरित्रवान, मर्यादित, कर्तव्यपरायण, सेवा, व परोपकार परिपूर्ण जीवन व्यतीत करता है। पांडव परमात्मा के करीब व प्रेमी होते हुए भी जीवन भर संघर्ष, कष्टों से ही घिरे रहे प्रभु की कृपा से या अपने किन्हीं सतकर्मों के परिणाम स्वरूप परमात्मा का साथ तो अवश्य मिला लेकिन जुआ खेलना, स्त्री तक को दाँव पर लगाना, किसी गिरते को देखकर मज़ाक उड़ाना, तीखे व्यंग्य बाण सुनाना, परमात्मा ने तो नहीं सिखाया, द्रोपदी ने दुर्योधन को धोखा खाकर ठोकर लगने पर जैसे हँसी उड़ाते हुए कहा कि अंधे की अंधी औलाद रही।

महाराज श्री ने कहा कि आपकी कोई भी क्रिया, चेष्टा, व्यवहार या कर्म ऐसा न हो जाए जिसे देखकर कोई उंगली उठाये। आपके जीवन में वांछित परिवर्तन भी आना चाहिए। अपनी गलतियों और बुराइयों को समझें व दूर करें। दूसरों पर मिथ्या दोषारोपण से कहीं बेहतर है कि स्वयं आत्म अन्वेषण करें। कई बार हम स्वयं गलतियां करते हैं, स्वयं अपने हाथो अपने लिए पतन का गड्ढा खोदते हैं व दोष दूसरों को देते हैं। दूसरों में दोष ढूंढने के कारण हमें अपने अंदर दोष होते हुए भी दिखाई नहीं देते। आंखें सबको देखती है पर अपने को नहीं देख पाती। निष्पक्ष ,शांत, एकाग्रचित्त होकर अपनी आत्मा की आवाज़ सुनें, तो पता चल जाएगा कि लोग हमें क्या समझते हैं, हमारा मन क्या समझता है, परन्तु वास्तव में हम हैं क्या ? किसी को दोष क्यों देते हो अपनी अनेक आंतरिक दुर्बलताएँ ही विनाश का कारण बनती है। उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन को श्रेष्ठ व मर्यादित बनाने के लिए जहाँ से अच्छाई मिले वहाँ से ग्रहण करके अपने जीवन को समाज के लिए कल्याणकारी श्रेष्ठ व मर्यादित बनाए। संसार में किसी को भी, कभी भी, किसी प्रकार से भी दुख, भय या कलेश नहीं पहुँचना चाहिए। तथा न ही पहुँचाने की प्रेरणा या इच्छा करनी चाहिए। सदैव सत्य स्वरूप परमात्मा की ही शरण लेनी चाहिए। हमें प्रभु का कृपा पात्र बनने की कोशिश करनी चाहिए दया पात्र नहीं। प्रेम पूर्वक की गई भक्ति से परमात्मा प्रसन्न होते हैं। और अपने भक्तों पर कृपा करते हैं।

उन्होंने कहा कि आत्मा व परमात्मा एक ही है मगर फिर भी अलग हैं। परमात्मा सृष्टि के कण कण में विद्यमान् है और आत्मा उसके एक अंश में, परमात्मा का आत्मा के बिना अस्तित्व है मगर आत्मा का परमात्मा के बिना कोई अस्तित्व नहीं है। परमात्मा का इस सृष्टि में सबसे एक ही नाता है भक्ति का। उसके यहाँ ऊँच-नीच, जाति-पाति आदि का कोई भेद नहीं है। परमात्मा के लिए तो एक मात्र प्रेमपूर्ण भक्ति ही सर्वस्व है। भक्तिहीन मनुष्य ठीक उसी प्रकार है जैसे बिना जल के बादल, चाहे वह कितने ही उज्जवल क्यों न हो, मगर किसी के काम के नहीं होते। भक्तिहीन जीवन कितनी ही विशेषताओं से पूर्ण होने पर भी बेकार है।भक्तिमय मनुष्य परमात्मा को अत्यंत प्रिय होते हैं। और वही विशेष कृपा के अधिकारी होते साथ नहीं रहता तथा परमात्मा का साथ कभी नहीं छूटता है। अतः हमें जगत की यथासामरथय सेवा करनी चाहिए। तथा सेवा का अवसर मिलने पर स्वयं को सौभाग्यशाली समझना चाहिए व सेवा के आये इस अवसर को हाथ से न जाने देने पर स्वयं को परम सौभाग्यशाली समझना चाहिए। हमें जगत में जब भी संत, गुरू, परमात्मा, बुजुर्ग, माता-पिता व धर्म एवं संस्कृति की सेवा का अवसर मिले तो सेवा अवश्य करनी चाहिए।

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