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क्षमावाणी से होती है विचारों की शुद्धता

आलेख :: आशीष जैन {उप संपादक} दैनिक जबलपुर दर्पण (94243 22600) ashishjain0722@gmail.com

जहाँ दया तहा धर्म है, जहाँ लोभ वहां पाप। जहाँ क्रोध तहा काल है, जहाँ क्षमा वहां आप। कबीर दास जी महराज कहते हैं कि जहाँ दया है वहीँ धर्म है और जहाँ लोभ है वहां पाप है, और जहाँ क्रोध है वहां सर्वनाश है और जहाँ क्षमा है वहाँ ईश्वर का वास होता है। जैन धर्म की शिक्षा से हमें क्षमा करना या क्षमा मांगना प्रमुखता से दिखाया जाता है मन से वचन से एवं काय से क्षमा का आयोजन और क्षमा करना पर्युषण महापर्व दसलक्षण धर्म का सारांश है। महापर्व पर्युषण के दौरान जैन धर्म के अनुयाई, श्रावक एवं श्राविकाएँ दसलक्षण पर्व के दिनों उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य तथा उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म का पालन करते है। इन्ही दस धर्मों को मिलाकर दसलक्षण पर्व बनता है। इन पर्वों की शुरुआत ही उत्तम क्षमा धर्म से होती है। जिसमें क्षमा करना या क्षमा मांगने का विशेष महत्व प्रदर्शित होता है। मध्य प्रदेश के जबलपुर संस्कारधानी में पर्युषण पर्व की समाप्ति के पांच दिन पश्चात प्रसिद्ध तीर्थ क्षेत्र पिसहारी की मडिया में संपूर्ण जैन समाज एवं महाकौशल क्षेत्र के नागरिक बंधु मिलकर क्षमावाणी का पर्व बड़े ही उत्साह के साथ वर्षों से मनाते आ रहे हैं। यह अश्विन माह के कृष्ण पक्ष की पंचमी के दिन भव्य मेले का भी आयोजन होता है इस अवसर पर जैन समाज के मुनि या माताजी उपस्थित जनसमूह को प्रवचन के माध्यम से क्षमा वाणी के महत्व को बताती हैं और सभी मिलकर बड़े ही उत्साह के साथ क्षमावाणी का पर्व मनाते हैं। सभी जन एक दूसरे से उत्तम क्षमा या मिच्छामी दुक्कड़म कहते है। मिच्छामी दुक्कड़म प्राकृत भाषा का शब्द है। मिच्छामी का अर्थ क्षमा और दुक्कड़म का अर्थ दुष्ट कर्म होता है अर्थात जाने-अनजाने किए गए बुरे कर्मों के प्रति क्षमा याचना करना है। क्षमा वीरस्य भूषणम्। क्षमा वीरों का भूषण है। कमजोर, असमर्थ अथवा कायर क्षमा कर सकने की शक्ति धारण ही नहीं करता, जो शक्तिधारी है, वीर है, वही क्षमावान हो सकता है। क्षमावणी या क्षमा दिवस जैन धर्म के अनुयायियों द्वारा मनाया जाने वाला एक पर्व है। दिगम्बर इसे अश्विन कृष्ण मास की एकम को मनाते हैं। श्वेतांबर इसे अपने आठ दिवसीय पर्यूषण पर्व के अंत में मनाते है। इस पर्व पर सब अपनी भूलों की क्षमा याचना की जाती है। इसे क्षमावाणी, क्षमावानी और क्षमा पर्व भी कहते है। संचार क्रांति के इस युग में व्यक्ति फोन, मेसेज तथा सोसल मीडिया के जरिए क्षमा याचना करते है। पहले जब संचार के सीमित संसाधन हुआ करते थे तब नागरिक क्षमावाणी पोस्ट कार्ड के द्वारा एक दूसरे से क्षमा याचना करते हैं।

संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज कहते हैं कि मत भेद और मन भेद को समाप्त करके एक हो जाओ, भगवान के मत की ओर आ जाओ फिर सारे संघर्ष समाप्त हो जाएंगे। महर्षि वेदव्यास जी कहते है कि क्षमा धर्म है, क्षमा यज्ञ है, क्षमावेद है और क्षमा शास्त्र है। जो इस प्रकार जानता है, वह सब कुछ क्षमा करने योग्य हो जाता। छमा बड़न को चाहिये, छोटन को उतपात। कह रहीम हरि का घट्यौ, जो भृगु मारी लात। रहीम दास कहते है कि बड़ों को क्षमा शोभा देती है और छोटों को उत्पात या बदमाशी। अर्थात् अगर छोटे बदमाशी करें कोई बड़ी बात नहीं और बड़ों को इस बात पर क्षमा कर देना चाहिए। छोटे उत्पात मचाएं तो उनका उत्पात भी छोटा ही होता है। जैसे यदि कोई कीड़ा भृगु अगर लात मारे भी तो उससे कोई हानि नहीं होती। रामधारी सिंह दिनकर जी ने कहा है कि क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो। उसको क्या, जो दंतहीन, विषरहित विनीत सरल हो।

जब तक मन से कटुता दूर नहीं होगी, तब तक क्षमावाणी पर्व मनाने का कोई अर्थ नहीं है। आमतोर पर देखा गया है कि व्यक्ति जिध बंधुओं से संबंध अच्छे है उन से क्षमा याचना करता है। उन से नही जिन से हकीकत मै बुराई है या कटुता है। जैन धर्म क्षमाभाव ही सिखाता है। हमें भी रोजमर्रा की सारी कटुता, कलुषता को भूलकर एक-दूसरे से माफी मांगते हुए और एक-दूसरे को माफ करते हुए सभी गिले-शिकवों को दूर कर क्षमा-पर्व मनाना चाहिए। पूरे बर्ष मेरे द्वारा,जाने अनजाने मैं, बोल चाल मैं, हंसी मजाक मैं, समाचार प्रकाशन या आलेख प्रकाशन में, आमने सामने या फोन पर, फेसबुक या वाटसप पर, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष, आपका सभी का मन दु:खाया हो, गलत किया या गलत लगा हो, मेरे कारण किसी को उद्वेग हुआ हो, तो में मन, वचन और काया से आप सभी से उत्तम क्षमा मांगता हूँ। जय जिनेन्द्र।।

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