सतना में टाइगर रिज़र्व पर टला फैसला, हमें ‘बाघ नहीं, घर चाहिए’

सतना जबलपुर दर्पण । प्रस्तावित सरभंगा टाइगर रिज़र्व को लेकर चल रही बहस अब एक नई दिशा में मुड़ती दिखाई दे रही है। जहां एक ओर केंद्र सरकार की योजना थी कि सतना-चित्रकूट क्षेत्र को बाघों के लिए आरक्षित घोषित किया जाए, वहीं अब यह योजना स्थानीय विरोध के चलते ठंडी बस्ते की ओर बढ़ रही है।जिले के सांसद और विधायक दोनों ने इस प्रस्ताव को लेकर चुप्पी तोड़ी है। सूत्रों के अनुसार, दोनों जनप्रतिनिधियों का मत है कि बाघों से पहले यहां के बचे हुए वोट बैंक को सुरक्षित रखना ज़रूरी है। उनका मानना है कि टाइगर रिज़र्व बनने से हजारों आदिवासी परिवार विस्थापन के भय में जीने लगेंगे और सरकार की ‘जनजातीय हितैषी’ छवि पर सवाल उठ सकते हैं।स्थानीय आदिवासी समुदाय ने खुलकर इस प्रस्ताव का विरोध किया है। उनका कहना है, “हमें बाघ नहीं चाहिए, हमें घर, खेत और जंगल चाहिए। विस्थापन की आशंका से सहमे आदिवासी नेताओं ने सरकार से ‘रिज़र्व काऊ’ योजना लाने की मांग की है, जिसमें गायों को संरक्षण मिले और वनवासी समुदाय को विस्थापित न किया जाए।बाघ नहीं, गाय चाहिए” बना नारागांवों में अब “बाघ नहीं, गाय चाहिए, बाघ आया तो हम जाएँगे जैसे नारे सुनने को मिल रहे हैं। क्षेत्र के कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि इस क्षेत्र को गौ अभ्यारण के रूप में विकसित किया जाए, जिससे पर्यावरण संरक्षण भी हो और लोगों का जीवन भी न उजड़े।सरकार असमंजस मेंसरकार अब दो पाटों के बीच फंसी नजर आ रही है – एक ओर राष्ट्रीय वन्यजीव नीति का दबाव है।दूसरी ओर ज़मीनी वोटों का गणित। अब देखना ये है कि इस खींचतान में बाघ बचेंगे या बैलट?



